खाकी-खादी की मिलीभगत से फल-फूल रहा अवैध ‘कबाड़ साम्राज्य’, कानून को जेब में रखकर दौड़ रहीं माफिया की गाड़ियाँ

शहडोल। जिले में कानून का राज है या माफिया का? यह सवाल आज हर उस आम नागरिक की जुबान पर है जो दिन-रात सड़कों पर अवैध कबाड़ से लदी गाड़ियों को सरपट दौड़ते देख रहा है। SECL हो या रेलवे का कीमती सामान, कबाड़ माफिया के लिए सब कुछ महज़ ‘मुनाफे का सौदा’ बनकर रह गया है।

कानून को जेब में लेकर घूम रहे ‘चोरों के सरताज’

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह तथाकथित धर्म का प्रचारक असल में अपराध का ऐसा ‘सरताज’ बन बैठा है, जिसके आगे न तो खाकी की वर्दी का डर है और न ही कानून का सम्मान। जिस तरह से बिना किसी रोक-टोक के अवैध माल की खेपें ठिकाने लगाई जा रही हैं, उससे यह साफ जाहिर होता है कि कानून व्यवस्था को इनके द्वारा ‘जेब’ में रखा गया है।

दर्जनों थानों का सफर, फिर भी बेखौफ दौड़

सबसे बड़ा सवाल बुढ़ार से लेकर पूरे जिले की पुलिसिंग पर उठता है। कबाड़ से लदी ये गाड़ियां जब अवैध ठिकानों से निकलती हैं, तो रास्ते में दर्जन भर से ज्यादा पुलिस चौकियां और थाने पड़ते हैं। इसके बावजूद इन गाड़ियों का न रुकना, न चेकिंग होना और न ही कार्रवाई होना, किसी बड़ी मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

मिलीभगत का खुला सच

जनता पूछ रही है कि क्या थानों की सीमाएं इन माफियाओं के लिए ‘सुरक्षित गलियारे’ बन गई हैं?

प्रशासन की चुप्पी

SECL और रेलवे की संपत्ति की चोरी सीधे तौर पर सरकारी राजस्व और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान है, फिर भी जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं।

धर्म का ढोंग, धंधे में जोर

एक तरफ ये माफिया खुद को संतों का अनुयायी और धर्म का रक्षक बताने के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय रहता हैं, वहीं दूसरी तरफ ये रेलवे और SECL के कीमती लोहे को बेचकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। क्या धर्म की आड़ में ऐसे ‘अपराधियों’ को संरक्षण देना ही अब प्रशासन की नई नीति बन गई है?

क्या जिले के आला अधिकारी इस ‘कबाड़ सिंडिकेट’ की कमर तोड़ेंगे, या फिर यह सांठगांठ इसी तरह क्षेत्र को खोखला करती रहेगी? जनता अब कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन नहीं, बल्कि इन गाड़ियों की ज़ब्ती और माफिया की गिरफ्तारी चाहती है।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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