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‘कबाड़ सिंडिकेट’, माननीय मौन, खाकी के ‘ग्रीन कॉरिडोर’ में सुशासन का सरेंडर!

शहडोल। जब कानून की आंख पर पट्टी बंधी हो, तो न्याय होता है। लेकिन जब कानून के रखवालों, प्रशासनिक सूरमाओं और जनता के ‘माननीयों’ की आंखों पर स्वार्थ और गांधी छाप नोटों की पट्टी बंध जाए, तो शहडोल जैसा ‘कबाड़ तंत्र’ पैदा होता है। टनों वजनी चोरी का लोहा, रातों-रात ट्रकों में लोड होकर चमचमाती सड़कों से गुजरता है, आधे दर्जन थानों की पुलिस को ‘अदृश्य’ हो जाता है, और हमारे जनप्रतिनिधि? वे क्षेत्र के विकास का ‘ब्लूप्रिंट’ बनाने में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें इन भारी-भरकम ट्रकों की गड़गड़ाहट

राजनीति

‘कबाड़ सिंडिकेट’, माननीय मौन, खाकी के ‘ग्रीन कॉरिडोर’ में सुशासन का सरेंडर!

शहडोल। जब कानून की आंख पर पट्टी बंधी हो, तो न्याय होता है। लेकिन जब कानून के रखवालों, प्रशासनिक सूरमाओं और जनता के ‘माननीयों’ की आंखों पर स्वार्थ और गांधी छाप नोटों की पट्टी बंध जाए, तो शहडोल जैसा ‘कबाड़ तंत्र’ पैदा होता है। टनों वजनी चोरी का लोहा, रातों-रात ट्रकों में लोड होकर चमचमाती सड़कों से गुजरता है, आधे दर्जन थानों की पुलिस को ‘अदृश्य’ हो जाता है, और हमारे जनप्रतिनिधि? वे क्षेत्र के विकास का ‘ब्लूप्रिंट’ बनाने में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें इन भारी-भरकम ट्रकों की गड़गड़ाहट

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शहडोल। जब कानून की आंख पर पट्टी बंधी हो, तो न्याय होता है। लेकिन जब कानून के रखवालों, प्रशासनिक सूरमाओं और जनता के ‘माननीयों’ की आंखों पर स्वार्थ और गांधी छाप नोटों की पट्टी बंध जाए, तो शहडोल जैसा ‘कबाड़ तंत्र’ पैदा होता है। टनों वजनी चोरी का लोहा, रातों-रात ट्रकों में लोड होकर चमचमाती सड़कों से गुजरता है, आधे दर्जन थानों की पुलिस को ‘अदृश्य’ हो जाता है, और हमारे जनप्रतिनिधि? वे क्षेत्र के विकास का ‘ब्लूप्रिंट’ बनाने में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें इन भारी-भरकम ट्रकों की गड़गड़ाहट