मानदेय को तरसे जनपद पंचायतों के कर्मचारी, योजनाओं का बोझ कंधों पर और जेब खाली

शहडोल। मध्य प्रदेश की जनपद पंचायतों में कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर, बीसी, अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी, उपयंत्री और रोजगार सहायकों के सामने इन दिनों आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। आरोप है कि कई जिलों में कर्मचारियों को महीनों से मानदेय का भुगतान नहीं हुआ है, जिससे उनके सामने परिवार चलाने तक की समस्या खड़ी हो गई है।

एक ओर प्रदेश सरकार विभिन्न योजनाओं, विकास कार्यों और उनके प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं योजनाओं को जमीनी स्तर पर अमल में लाने वाले कर्मचारी अपने वेतन और मानदेय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। कर्मचारियों का कहना है कि जब किसी योजना के लक्ष्य पूरे कराने होते हैं तो अधिकारियों द्वारा दिन-रात काम कराया जाता है, लेकिन भुगतान की बात आते ही बजट और प्रक्रिया का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचा जाता है।

योजनाओं की रीढ़ बने कर्मचारी परेशान

ग्रामीण विकास और पंचायत विभाग की कई महत्वपूर्ण योजनाओं का संचालन इन्हीं कर्मचारियों के माध्यम से होता है। रोजगार गारंटी योजना से लेकर पंचायतों के डिजिटल कार्य, निर्माण कार्यों की निगरानी और विभिन्न सरकारी योजनाओं की रिपोर्टिंग तक का जिम्मा इन्हीं के कंधों पर है। बावजूद इसके समय पर मानदेय न मिलना कर्मचारियों में भारी नाराजगी पैदा कर रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि कई साथियों को बच्चों की फीस, मकान किराया और दैनिक जरूरतों के खर्च पूरे करने में कठिनाई हो रही है। लगातार बढ़ती महंगाई के बीच महीनों तक भुगतान न होना उनके लिए मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की परेशानी का कारण बन गया है।

सवालों के घेरे में व्यवस्था

कर्मचारियों का आरोप है कि विभागीय अधिकारी केवल काम लेने तक सीमित हैं, लेकिन उनके हितों और समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनका कहना है कि यदि शासन की योजनाओं को सफल बनाने में मैदानी अमला महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो उसके मानदेय का भुगतान भी प्राथमिकता में होना चाहिए।

कब खुलेगी सरकार और प्रशासन की आंख?

कर्मचारियों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर उनकी पीड़ा कौन सुनेगा। 

विकास और सुशासन के बड़े-बड़े दावों के बीच यदि योजनाओं को धरातल पर लागू करने वाले कर्मचारी ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

अब निगाहें शासन और प्रशासन पर टिकी हैं कि वे इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर लंबित मानदेय का भुगतान कब तक सुनिश्चित करते हैं। क्योंकि योजनाओं का सफल क्रियान्वयन तभी संभव है, जब उन्हें संचालित करने वाले कर्मचारियों को समय पर उनका अधिकार मिले।

जनहित से जुड़ा यह मुद्दा अब केवल कर्मचारियों का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न बन चुका है।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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