विज्ञापनों में ‘संजीवनी’, हकीकत में …?, पीआर स्टंट के पीछे कराहता आम मरीज़

शहडोल। जब विज्ञापन,पोस्टर,बैनर से किसी निजी अस्पताल के ‘त्याग’, ‘तपस्या’ और ‘मानवता’ के बखान से पूरे जिले और संभाग को रंग दिए जाएं, तो समझ लीजिए कि पर्दे के पीछे मुनाफे की कोई बड़ी पटकथा लिखी जा चुकी है। हाल ही में शहडोल संभाग के एक तथाकथित ‘सुपर स्पेशलिटी’ अस्पताल ने अपनी 5 वर्ष की यात्रा को भुनाने के लिए पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन छपवाए हैं, जिनमें संतों के आशीर्वाद से लेकर माननीयों तक के प्रशस्ति पत्र शामिल हैं। लेकिन इन चमकते पन्नों के ठीक पीछे, अस्पताल के रिसेप्शन, आईसीयू और बिलिंग काउंटर पर खड़ी आम जनता की सच्चाई बेहद स्याह और चुभने वाली है।

‘कैशलेस’ के नाम पर जेब पर डाका

विज्ञापनों में आयुष्मान भारत और सभी टीपीए इंश्योरेंस से “शत-प्रतिशत कैशलेस इलाज” का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आयुष्मान कार्ड धारक गरीब जब इन ‘संजीवनी केंद्रों’ की चौखट पर पहुँचता है, तो उसे अक्सर ‘सर्वर डाउन है’, ‘पैकेज में दवाइयां शामिल नहीं हैं’ या ‘बेड फुल हैं’ कहकर टरका दिया जाता है। जो भर्ती हो भी जाते हैं, उन्हें डिस्चार्ज के वक्त उपभोज्य सामग्री और बाहर की महंगी दवाइयों के नाम पर थमाया गया लंबा-चौड़ा बिल उनकी कमर तोड़ देता है।

‘इलाज की थाली’ या सिर्फ फोटो-ऑप?

‘जनरल वार्ड के मरीजों के लिए निशुल्क भोजन व्यवस्था’ का दावा कागजों पर जितना सुंदर लगता है, वार्डों के भीतर मरीजों के तीमारदारों की बेबसी उसे उतना ही खोखला साबित करती है। हकीकत यह है कि यह ‘इलाज की थाली’ अक्सर सिर्फ विज्ञापनों के फोटोशूट और गिने-चुने मरीजों तक सीमित रह जाती है। दूर-दराज के गांवों से आए मरीज के परिजन आज भी कड़ाके की ठंड या चिलचिलाती धूप में बाहर के ढाबों या फुटपाथ पर खाना खाने को मजबूर हैं।

माननीयों का प्रशस्ति गान और प्रशासन की चुप्पी

सबसे अधिक चुभने वाली बात यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों को इन निजी अस्पतालों की मनमानी और भारी-भरकम बिलिंग पर लगाम कसनी चाहिए, वे खुद इन अस्पतालों के ‘अद्वितीय प्रबंधन’ की तारीफों के पुल बांध रहे हैं। जब सत्ता पक्ष के विधायक ही अस्पताल के पीआर कैंपेन और विज्ञापन का हिस्सा बन जाएं, तो आम आदमी न्याय की गुहार लेकर कहां जाए? सीएमएचओ, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी इस पूरे खेल में उनकी मूक सहमति की ओर इशारा करती है।

जवाबदेही से भागता ‘मानवता’ का चोला

अगर यह अस्पताल वाकई ‘मानवता की मिसाल’ और ‘शहडोल को आत्मनिर्भर’ बनाने का केंद्र है, तो पिछले पांच सालों में कितने गरीब मरीजों का बिना एक भी रुपया और बिना सरकारी क्लेम लिए ‘पूर्ण निशुल्क’ इलाज किया गया, इसका श्वेत पत्र सार्वजनिक किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाएं कोई इवेंट मैनेजमेंट या छवि चमकाने का साधन नहीं हैं, बल्कि यह एक बुनियादी अधिकार है, जिसका इस तरह के पीआर स्टंट के बीच गला घोंटा जा रहा है।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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