शहडोल। किसी भी जिले की पहचान उसके विकास, नागरिक सुविधाओं और कानून व्यवस्था से होती है। लेकिन शहडोल की तस्वीर इन कसौटियों पर लगातार सवालों के घेरे में दिखाई देती है। संभागीय मुख्यालय होने के बावजूद आम नागरिक आज भी सड़क, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझने को मजबूर हैं।
सीवर लाइन के कारण शहर की सड़कें बरसात में गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। नालियों की सफाई और जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने से हल्की बारिश भी लोगों की परेशानी बढ़ा देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं और पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से पूरी तरह नहीं जुड़ सकी हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों तथा संसाधनों की कमी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। दूसरी ओर निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ती निर्भरता आम और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रही है।
कानून व्यवस्था के मोर्चे पर भी समय-समय पर अवैध खनन, रेत का अवैध परिवहन, नशे का कारोबार, भू-माफियाओं की गतिविधियां और वित्तीय अनियमितता जैसे मामलों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। सरकारी योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
लोगों का कहना है कि कार्रवाई अक्सर घटनाओं के बाद दिखाई देती है, जबकि अवैध गतिविधियों की रोकथाम और नियमित निगरानी अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखती। यदि कानून का भय समाप्त होने लगे और मूलभूत सुविधाएं भी नागरिकों तक समय पर न पहुंचें, तो विकास के दावों पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
संभागीय मुख्यालय होने के नाते शहडोल से अपेक्षा केवल सरकारी बैठकों और घोषणाओं की नहीं, बल्कि बेहतर सड़कें, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षित वातावरण, पारदर्शी प्रशासन और जवाबदेह व्यवस्था की है। विकास की वास्तविक कसौटी सरकारी आंकड़े नहीं, बल्कि आम नागरिक का जीवन स्तर होता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या शहडोल केवल योजनाओं और उपलब्धियों के दावों तक सीमित रहेगा, या फिर यहां के नागरिकों को वास्तव में बेहतर मूलभूत सुविधाएं और मजबूत कानून व्यवस्था भी देखने को मिलेगी।










