शहडोल। एक तरफ पुलिस महकमा है, कानून की बड़ी-बड़ी किताबें हैं, थाना प्रभारी से लेकर एसडीओपी तक की फौज है। दूसरी तरफ क्षेत्र के रसूखदार नाम हैं— फिर भोपाल में बैठी सरकार है, जिसके मुखिया सुशासन का दम भरते नहीं थकते। लेकिन इन सबके बीच एक यक्ष प्रश्न बुढार की फिजाओं में तैर रहा है आखिर बुढार का असली ‘मालिक’ कौन है?
क्या कानून का राज धरातल पर है, या फिर तमाम प्रशासनिक सूरमाओं को ठेंगा दिखाते हुए ‘बड्डे’ का कबाड़ सिंडिकेट इस पूरे इलाके को हांक रहा है?
थाना-पुलिस और बड़े-बड़े नाम… फिर भी ‘बड्डे’ का सिक्का बुलंद!
यह बेहद चौंकाने वाला और गंभीर विषय है कि जिस क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी-भरकम अमला तैनात है, वहां एक कबाड़ माफिया का रसूख सरकार और प्रशासन से भी बड़ा हो चुका है। मुख्यमंत्री, डीजीपी, कमिश्नर, कलेक्टर और एसपी—नियम-कायदों की यह लंबी फेहरिस्त ‘बड्डे’ के अवैध साम्राज्य के आगे बौनी नजर आती है।
जब स्थानीय थाना प्रभारी और अनुविभागीय अधिकारी जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी मूकदर्शक बन जाएं, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस ‘मौन’ की कीमत क्या है?
इंटेलिजेंस फेल या आंखें बंद
पुलिस का खुफिया तंत्र इतना मजबूत माना जाता है कि परिंदा भी पर मारे तो खबर हो जाती है, लेकिन करोड़ों रुपये के इस समानांतर कबाड़ सिंडिकेट की भनक आला अफसरों को नहीं लगती, यह गले से नीचे नहीं उतरता।
अगर बुढार पुलिस कुछ नहीं करती, तो…
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर बुढार पुलिस इस कबाड़ माफिया के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाती या यह कहें कि ‘उठा नहीं सकती’, तो इसके क्या मायने निकाले जाएं?
प्रशासनिक इकबाल का अंत
यदि स्थानीय पुलिस ‘बड्डे’ के सामने बेबस है, तो यह माना जाएगा कि शहडोल जिले में कानून का इकबाल पूरी तरह खत्म हो चुका है और सत्ता की कमान अब माफिया के हाथों में है।
ऊपर तक जुड़े हैं तार
बुढार पुलिस की यह ‘मजबूरी’ साफ इशारा करती है कि इस काले खेल की कमान सिर्फ स्थानीय स्तर पर नहीं है। इसके तार भोपाल में बैठे सफेदपोशों और राजधानी के गलियारों से जुड़े हैं, जिन्हें इस काली कमाई से ‘ईंधन’ मिल रहा है।
जनता का अविश्वास
जब रक्षक ही भक्षक के सामने नतमस्तक हो जाएं, तो आम जनता का न्याय प्रणाली और पुलिस व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।
माननीयों’ का मौन और प्रभारी मंत्री की ‘समीक्षा’
क्षेत्रीय विधायक और सांसद महोदया, जो हर छोटे-बड़े आयोजन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, इस ‘महाघोटाले’ पर पूरी तरह मौन व्रत धारण किए हुए हैं। वहीं, प्रभारी मंत्री जी का शहडोल दौरा सिर्फ वातानुकूलित कमरों में बैठकें करने, काजू-कतली और समोसों का लुत्फ उठाने तक सीमित रह गया है। कानून व्यवस्था की समीक्षा की फाइलों के नीचे दबे इस ‘एंट्री सिस्टम’ की गंध शायद भोपाल तक नहीं पहुंच पा रही है।
क्या सूबे के मुख्यमंत्री और डीजीपी इस खुलेआम चल रहे कबाड़ राज पर संज्ञान लेंगे? क्या बुढार पुलिस अपनी खोई हुई साख वापस पाने के लिए इस सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करेगी, या फिर ‘बड्डे’ का यह कबाड़ साम्राज्य यूं ही बेखौफ होकर सुशासन को मुंह चिढ़ाता रहेगा?
Author: सुभाष गौतम
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