खाली खजाने के बावजूद निर्माण की ‘जल्दबाजी’, नियमों को ठेंगे पर रख रही इंजीनियर-एसडीओ-सीईओ की तिकड़ी!

शहडोल। जनपद पंचायत सोहागपुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत छतवई इन दिनों भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बन गई है। यहाँ विकास की गंगा नहीं, बल्कि ‘कमीशन का नाला’ बह रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि एक तरफ पंचायत के पास बजट का अभाव बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बिना किसी ठोस प्रस्ताव और बिना किसी प्रशासनिक जरूरत के सीसी रोड का निर्माण युद्ध स्तर पर जारी है।

नियमों का ‘खून’, टाइड और अनटाइड फंड का घालमेल

सरकारी नियमों के मुताबिक, ‘टाइड’ और ‘अनटाइड’ फंड के उपयोग की स्पष्ट सीमाएं हैं। टाइड फंड विशेष रूप से स्वच्छता और जल संरक्षण जैसे कार्यों के लिए होता है, जबकि अनटाइड फंड अन्य विकास कार्यों के लिए। लेकिन बड़ी छतवई में इंजीनियर आशुतोष शर्मा और उनकी टीम ने इन फंड्स को अपनी सुविधा का ‘पिग्गी बैंक’ बना लिया है। बिना किसी पूर्व प्रस्ताव के काम शुरू कर देना यह दर्शाता है कि यहाँ पंचायत राज नहीं, बल्कि ‘अफसर राज’ चल रहा है।

पुराने काम अधूरे, नए का ‘लालच’ क्यों?

ग्रामीणों का सवाल है कि जब पुराने निर्माण कार्यों की सीसी जारी नहीं हुई है, तो नए कामों की इतनी हड़बड़ी क्यों? जवाब साफ है—नई फाइल, नया कमीशन। पुराने कामों की गुणवत्ता खराब होने के कारण उनकी सीसी अटकी हुई है, लेकिन अपनी तिजोरी भरने के लिए यह तिकड़ी नए-नए निर्माण कार्यों का जाल बुन रही है।

 शातिर खिलाड़ी कौन? किसके कंधे पर बंदूक?

इस खेल में इंजीनियर आशुतोष शर्मा फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं, जिन्हें एसडीओ का मौन समर्थन और सीईओ की ‘सुरक्षा ढाल’ प्राप्त है।

  शिकार कौन? भोली-भाली जनता और सरकारी खजाना।

  मजबूरी क्या? कोई मजबूरी नहीं, बल्कि ‘ठेकेदारी प्रथा’ को बढ़ावा देने का लालच है। मजदूरों के बजाय मशीनों से काम कराना यह साबित करता है कि शासन की मंशा को ये अधिकारी अपने जूतों तले रौंद रहे हैं।

लैब नहीं या नीयत में खोट?

सड़क निर्माण में उपयोग हो रही चोरी की रेत और घटिया मटेरियल की जांच के लिए क्या जनपद के पास लैब नहीं है? हकीकत यह है कि लैब से ज्यादा ‘इच्छाशक्ति’ की कमी है। अगर साइट विजिट हो गई और मटेरियल फेल हो गया, तो ‘कमीशन’ का गणित बिगड़ जाएगा। इसीलिए साहब लोग वातानुकूलित कमरों में बैठकर फाइलों पर ‘सब चंगा सी’ की मुहर लगा रहे हैं।

 सूचना पटल का गायब होना, एक सोची-समझी साजिश

‘मिस्टर इंडिया’ बने सूचना पटल का न होना महज़ एक लापरवाही नहीं है। यह जनता के ‘सूचना के अधिकार’ की हत्या है। जब बजट और एजेंसी का पता ही नहीं होगा, तो कोई शिकायत किस आधार पर करेगा? यह पारदर्शिता को खत्म कर अंधेरगर्दी मचाने का सीधा तरीका है।

सवाल साहब से

जिला प्रशासन आखिर कब तक इस ‘अमर प्रेम कहानी’  का दर्शक बना रहेगा? क्या कलेक्टर महोदय और जिला पंचायत सीईओ “बिना प्रस्ताव वाले चमत्कारिक निर्माण” की उच्च स्तरीय जांच कराएंगे, या फिर बड़ी छतवई की यह सड़क पहली बारिश में बहकर भ्रष्टाचार की एक और कहानी बनकर रह जाएगी?

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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