रिटायरमेंट का ‘शुद्धिकरण’ और धर्म का ‘चक्रव्यूह’

 शहडोल। जिले में इन दिनों चाहे कोई भी समाज हो वो शक्ति प्रदर्शन करने में आमदा हैं…?

परशुराम, महाराणा प्रताप,नायक नहीं खलनायक नहीं सहित लगभग हर समाज अपनी अहम भूमिका समाज के प्रति संपूर्ण जिम्मेदार निभाते हुए आगे बढ़ रहे हैं….?

कलम थामने की उम्र में ‘झंडा’ थमाने की साजिश

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जो अधिकारी कल तक फाइलों में युवाओं के भविष्य पर कुंडली मारकर बैठे थे, आज वे जनपद स्तर के नेताओं के साथ मिलकर एक नया खेल खेल रहे हैं। समाज के पढ़े-लिखे, प्रतिभाशाली युवाओं को रोजगार और नवाचार की ओर प्रेरित करने के बजाय, उन्हें ‘धर्म की रक्षा’ के नाम पर धार्मिक उन्माद और गली-मोहल्ले की राजनीति के मैदान में धकेला जा रहा है।

 साहब जब पद में थे.. तब युवाओं के लिए ‘करियर काउंसलिंग’ याद नहीं आई, और अब जब कुर्सी छिन गई, तो उन्हें ‘लाठी और झंडा’ थमाकर अपनी सुरक्षा दीवार बना रहे हैं।

  पाप’ धोने का नया वाशिंग पाउडर, समाज सेवा

रिटायरमेंट के बाद अचानक उपजा यह प्रेम दरअसल भ्रष्टाचार का बीमा’ है। जनपद स्तर के नेताओं को ऐसे रिटायर्ड अधिकारियों की ‘ऊपरी कमाई’ और ‘अनुभव’ चाहिए, और अधिकारियों को नेताओं का ‘राजनीतिक संरक्षण’।

“कल तक जो साहब जनता को दुत्कारते थे, आज वे मंचों पर हाथ जोड़कर ‘संस्कार’ सिखा रहे हैं। यह हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि पुराने पापों पर ‘गंगाजल’ छिड़कने की नाकाम कोशिश है।”

 जनपद के ‘पार्टी-भक्त’ और रिटायर ‘मठाधीश’

जनपद स्तर पर तैनात वे नेता, जो केवल अपनी पार्टी के आकाओं को खुश करने में लगे हैं, इन रिटायर्ड अधिकारियों को ‘कैश काउ’  की तरह इस्तेमाल करते हैं। इनके बीच एक अलिखित समझौता है?

  जांच एजेंसियों की रडार से बचना और समाज में ‘सम्मानित’ बने रहना।

 नेता का फायदा,  चुनाव के समय इन अधिकारियों के रसूख और संसाधनों का उपयोग करना।

निशाने पर युवा, खेल धर्म का, दांव सत्ता का

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे खेल में मोहरा मध्यमवर्गीय और गरीब युवा बन रहा है।

  पढ़ने-लिखने वाले युवाओं को यह समझाया जा रहा है कि पढ़ाई से ज्यादा जरूरी ‘मैदान की सक्रियता’ है।

 उन्हें तर्क के बजाय ‘नारे’ सिखाए जा रहे हैं?

 उन्हें ‘डिजिटल इंडिया’ के दौर में ‘अतीत के गौरव’ में उलझाकर वर्तमान की बेरोजगारी से ध्यान भटकाया जा रहा है?

समाज है या मजाक…?

शहडोल जैसे जिले में, जहाँ विकास की अपार संभावनाएँ हैं, वहां इन ‘अवसरवादी’ रिटायर्ड अधिकारियों और जनपद के ‘कथित’ ठेकेदारों का यह गठजोड़ समाज को पीछे ले जा रहा है।

 साहब, अगर समाज की इतनी ही फिक्र थी, तो जब कलम में ताकत थी तब ‘स्याही’ क्यों सूख गई थी? आज जब हाथ खाली हैं, तो ‘सेवा’ की अलख जगाना सिर्फ एक सियासी ढोंग है। युवाओं को ‘धर्म के खेल’ में मत धकेलिए, उन्हें उस लायक बनाइए कि वे अपना धर्म और कर्म खुद पहचान सकें।

सावधान रहे समाज के तथाकथित नेताओं से..

 क्योंकि ये वो लोग हैं जिन्होंने उम्र भर ‘पेंशन’ का इंतजाम किया है और अब आपकी ‘भावनाओं’ से खेलकर अपनी ‘टेंशन’ दूर करना चाहते हैं। क्योंकि इनके बच्चों और परिवार का भविष्य सुरक्षित है… क्या आपका और आपके परिवार भी….? मान लीजिए कल आप नहीं रहे तो?? ये समाज और तथाकथित नेता परिवार का संबल और सहायता देंगे..? है इनसे। उम्मीद..? फैसला जनहित में जनहित के लिए।

Leave a Comment

और पढ़ें

Cricket Live Score

Corona Virus

Rashifal

और पढ़ें