शहडोल। सरकारी तंत्र में बैठे कुछ रसूखदार किस कदर संवेदनहीन हो सकते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण जनपद पंचायत बुढ़ार के ग्राम पंचायत चकौडिया में देखने को मिला है। यहाँ एक गरीब ग्रामीण, रामसहोदर यादव, पिछले 5 सालों से अपनी मेहनत के ₹24,000 रुपये के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है, लेकिन सचिव महोदय के पास बहानों की लंबी फेहरिस्त है।
पारिवारिक आयोजनों का बहाना और अब सीधे धमकी
आवेदक रामसहोदर यादव ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2020-21 में पंचायत भवन की बाउंड्रीवॉल निर्माण के दौरान उन्होंने अपने ट्रैक्टर से रेता और गिट्टी की सप्लाई की थी। जब भुगतान की बारी आई, तो तत्कालीन सचिव अवधेश शर्मा ने भावनाओं का ऐसा जाल बुना कि न्याय भी शर्मसार हो जाए।
2021 में कहा, “बेटी की शादी में पैसे खर्च हो गए, पेमेंट आते ही दे दूंगा”।
कुछ समय बाद, “लड़के की शादी अचानक तय हो गई, थोड़ा और रुको”।
पिछले वर्ष, “अम्मा खत्म हो गईं, सारा पैसा वहां लग गया”।
हैरानी की बात यह है कि जैसे ही सचिव के व्यक्तिगत “खर्चों” की लिस्ट खत्म हुई, उनका व्यवहार बदल गया। अब सचिव महोदय सीधे तौर पर कह रहे हैं कि “मेरा दिमाग खराब है, पैसे नहीं दूंगा, जो करना हो करो, मैं किसी से नहीं डरता”।
“विश्वास की सजा”
पीड़ित रामसहोदर खुद उसी पंचायत में ग्राम रोजगार सहायक के पद पर कार्यरत हैं, इसी ‘अपनेपन’ और ‘विश्वास’ के नाते उन्होंने आज तक उच्चाधिकारियों से शिकायत नहीं की थी। लेकिन सचिव की दबंगई ने अब उन्हें मुख्य कार्यपालन अधिकारी के दरवाजे पर खड़ा कर दिया है।
अधिकारियों का ‘करारा तंज’ और मौन स्वीकृति
विभागीय गलियारों में चर्चा है कि जब मजबूर आवेदक अपनी गुहार लेकर साहबों के पास पहुँचता है, तो उसे सांत्वना के बजाय अक्सर यह सुनने को मिलता है— “इतने साल तक क्या सो रहे थे?” या “आपसी मामला है, खुद सुलझा लो।” शासन के इन कारिंदों का यह तंज उस गरीब की मजबूरी पर नमक छिड़कने जैसा है, जिसने सिस्टम पर भरोसा करके अपना पसीना बहाया।
क्या प्रशासन ऐसे सचिव पर कार्रवाई करेगा जो सरकारी कार्यों के भुगतान को अपनी व्यक्तिगत जागीर समझकर खर्च कर देता है? या फिर ‘दिमाग खराब है’ जैसे गैर-जिम्मेदाराना बयानों के पीछे भ्रष्टाचार की उस बाउंड्रीवॉल की जांच होगी?












