शहडोल। बुढार थाना क्षेत्र से शुरू होने वाला अवैध कबाड़ का यह ‘काला खेल’ सिर्फ एक इलाके तक सीमित नहीं है। भारी-भरकम ट्रकों और पिकअप वाहनों में लोड होकर जब चोरी का कबाड़ सड़कों पर दौड़ता है, तो वह किसी अदृश्य मार्ग से नहीं, बल्कि जिला मुख्यालय और राष्ट्रीय राजमार्गों से होकर गुजरता है। हैरान करने वाली बात यह है कि रास्ते में पड़ने वाले आधे दर्जन थानों और पुलिस चौकियों को इस ‘ओवरलोड’ और अवैध खेप की भनक तक नहीं लगती। यह चुप्पी किसी तकनीकी खामी का नतीजा नहीं, बल्कि रूट पर चलने वाले एक सुनियोजित ‘एंट्री सिस्टम’ की गवाही देती है।
लोहे की खेप और खाकी का ‘ग्रीन कॉरिडोर’
SECL की खदानों और रेलवे ट्रैक के आस-पास से उड़ाया गया भारी लोहा रातों-रात ट्रकों में लोड किया जाता है। सूत्र बताते हैं कि इन वाहनों के निकलने का समय और रूट पहले से तय होता है।
सरहदों पर सन्नाटा
बुढार से माल लोड होने के बाद वाहन जब सोहागपुर, अमलाई, सिंहपुर या जिला मुख्यालय के थाना क्षेत्रों की सीमाओं को पार करते हैं, तो अमूमन चेकिंग पॉइंट निष्क्रिय हो जाते हैं।
‘कोड वर्ड’ का कमाल
इस सिंडिकेट में शामिल वाहन चालकों के पास कथित तौर पर एक खास ‘कोड वर्ड’ या टोकन होता है, जिसे दिखाते ही खाकी के पहरेदार अपनी नजरें फेर लेते हैं।
बदली जाती हैं नंबर प्लेटें
कार्रवाई से बचने के लिए जिला सीमा पार करने से पहले कई वाहनों की नंबर प्लेटें तक बदल दी जाती हैं, लेकिन सड़कों पर गश्त करने वाली पुलिस को इसमें कुछ भी संदिग्ध नजर नहीं आता।
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते विभाग
सरकारी संपत्ति की इस खुली लूट में केवल स्थानीय पुलिस ही कटघरे में नहीं है। इस पूरे नेटवर्क को फलने-फूलने देने में अन्य जिम्मेदार विभागों की रहस्यमयी खामोशी भी बराबर की साझीदार है।
रेलवे सुरक्षा बल
रेलवे के कबाड़ और उपकरणों की चोरी बिना स्थानीय स्तर पर साठगांठ के मुमकिन नहीं है। आरपीएफ का खुफिया तंत्र इस बड्डे नेटवर्क को पकड़ने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
परिवहन विभाग
बिना वैध कागजात, बिना रॉयल्टी और क्षमता से अधिक लोड होकर दौड़ने वाले ये ट्रक आरटीओ की नजरों से कैसे बच जाते हैं? क्या इन कबाड़ वाहनों के लिए चेकिंग के नियम बदल जाते हैं?
SECL का सुरक्षा अमला
खदानों की सुरक्षा के लिए तैनात निजी और विभागीय सुरक्षा अमले की नाक के नीचे से टनों भारी लोहा पार हो जाना, उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कबाड़ किंग के ‘मुखबिर’ थानों से भी तेज!
इस पूरे बड्डे नेटवर्क की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि कभी ऊपरी दबाव में किसी थाने की पुलिस कार्रवाई का मन बना भी ले, तो कबाड़ माफिया के ‘लाइनमैन’ और मुखबिर पल-पल की लोकेशन लीक कर देते हैं। पुलिस की गाड़ी थाने से निकलने से पहले ही अवैध कबाड़ से लदे वाहन अपना रास्ता बदल देते हैं या सुरक्षित ठिकानों पर पार्क कर दिए जाते हैं।
सत्ता और रसूख की ‘कथित’ ढाल
क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि इस कबाड़ किंग के तार सीधे राजधानी और संभाग के कुछ सफेदपोशों से जुड़े हैं। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर पदस्थ छोटे अधिकारी इन पर हाथ डालने से कतराते हैं। उन्हें डर होता है कि कार्रवाई की तो गाज माफिया पर गिरने के बजाय खुद उनके ट्रांसफर के रूप में उन पर गिर सकती है।
जनता मांग रही है जवाब
जब एक आम नागरिक की गाड़ी के कागजात न होने पर पुलिस और आरटीओ चालान काट देते हैं, तो टनों अवैध लोहा ले जा रहे ट्रकों को ‘फ्री पास’ क्यों मिला हुआ है?
बुढार से लेकर बाहरी जिलों की सीमाओं तक जितने भी थाने इस रूट में आते हैं, क्या वहां के प्रभारियों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
क्या शहडोल पुलिस के आला अधिकारी इस पूरे ‘रूट मैप और एंट्री सिस्टम’ की बारीकी से जांच कराकर इस सिंडिकेट को ध्वस्त करने का साहस दिखाएंगे?
यह महज कबाड़ की चोरी नहीं, बल्कि कानून के इकबाल की चोरी है। यदि इस बड्डे नेटवर्क के रूट को ट्रैक कर इस पर कानूनी बुलडोजर नहीं चलाया गया, तो जनता का प्रशासनिक निष्पक्षता से भरोसा उठना तय है। अब देखना यह है कि इस कबाड़ माफिया के ‘ग्रीन कॉरिडोर’ पर खाकी का डंडा कब चलता है।










