‘कबाड़ सिंडिकेट’, माननीय मौन, खाकी के ‘ग्रीन कॉरिडोर’ में सुशासन का सरेंडर!

शहडोल। जब कानून की आंख पर पट्टी बंधी हो, तो न्याय होता है। लेकिन जब कानून के रखवालों, प्रशासनिक सूरमाओं और जनता के ‘माननीयों’ की आंखों पर स्वार्थ और गांधी छाप नोटों की पट्टी बंध जाए, तो शहडोल जैसा ‘कबाड़ तंत्र’ पैदा होता है। टनों वजनी चोरी का लोहा, रातों-रात ट्रकों में लोड होकर चमचमाती सड़कों से गुजरता है, आधे दर्जन थानों की पुलिस को ‘अदृश्य’ हो जाता है, और हमारे जनप्रतिनिधि? वे क्षेत्र के विकास का ‘ब्लूप्रिंट’ बनाने में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें इन भारी-भरकम ट्रकों की गड़गड़ाहट सुनाई ही नहीं देती।

‘माननीयों’ का मौन व्रत, चुनाव में ‘विकास’ की हुंकार

क्षेत्र के विधायक जी और सांसद महोदया की सक्रियता वैसे तो सोशल मीडिया पर देखते ही बनती है—कहीं भूमिपूजन, तो कहीं फीता कटाई। लेकिन जैसे ही बात बुढार और सोहागपुर के रास्ते निकलने वाले अवैध कबाड़ की आती है, माननीयों के मुंह पर फेविकोल का मजबूत जोड़ लग जाता है।

क्षेत्रीय विधायक 

 विधानसभा में क्षेत्र की जनता की ‘आवाज’ उठाने का दावा करने वाले विधायक जी की नाक के नीचे से पूरा रेलवे ट्रैक और SECL का लोहा पार हो रहा है, लेकिन विधानसभा में इस ‘महाघोटाले’ पर एक अतारांकित प्रश्न तक पूछने की फुर्सत उन्हें नहीं मिली। शायद उनके लिए ‘कबाड़’ कोई मुद्दा ही नहीं है, आखिर ‘लोहा’ तो पिघल ही जाता है!

सांसद महोदया

 दिल्ली के गलियारों में शहडोल का प्रतिनिधित्व करने वाली सांसद महोदया का खुफिया तंत्र इतना कमजोर है कि उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र में चल रहे इस समानांतर ‘ग्रीन कॉरिडोर’ की भनक तक नहीं है। या फिर शायद वे मान चूंकि हैं कि ‘डिजिटल इंडिया’ में कबाड़ का यह खेल भी एक तरह का ‘स्टार्टअप’ ही है!

प्रभारी मंत्री का ‘पर्यटन’,समीक्षा बैठकों का समोसा और कबाड़ का भरोसा

जिले के प्रभारी मंत्री जी जब भी शहडोल के दौरे पर आते हैं, तो कलेक्ट्रेट के वातानुकूलित कमरों में अधिकारियों की भारी-भरकम बैठकें होती हैं। कानून-व्यवस्था की समीक्षा की जाती है, कड़े निर्देश दिए जाते हैं, और फिर सर्किट हाउस में काजू-कतली और समोसों का लुत्फ उठाकर मंत्री जी लौट जाते हैं।

मंत्री जी, जिस ‘समीक्षा’ की फाइल पर आप दस्तखत करते हैं, क्या कभी उस फाइल के नीचे दबे इस करोड़ों के ‘एंट्री सिस्टम’ की गंध आप तक नहीं पहुंचती? या फिर शहडोल की यह ‘काली कमाई’ सीधे राजधानी के सफेदपोशों के सियासी खर्च का ईंधन बन रही है, जैसा कि गलियारों में चर्चा आम है?

प्रशासन और पुलिस, आम जनता के लिए ‘सिंघम’, कबाड़ किंग के सामने ‘नतमस्तक’

शहडोल का जिला प्रशासन और पुलिस महकमा आम जनता के लिए कानून का ऐसा डंडा चलाता है कि देखकर रूह कांप जाए।

  यदि एक गरीब आदिवासी बिना हेलमेट के या बिना कागजात के मोटरसाइकिल लेकर निकल जाए, तो RTO और पुलिस मिलकर उसका वो चालान काटते हैं कि उसकी अगली पीढ़ी भी याद रखे।

 लेकिन, जब बिना रॉयल्टी, बिना वैध नंबर प्लेट और क्षमता से अधिक ओवरलोड होकर कबाड़ किंग के ट्रक गुजरते हैं, तो खाकी वर्दीधारी ‘कोड वर्ड’ मिलते ही ऐसे सैल्यूट ठोकते हैं जैसे देश का कोई सर्वोच्च पदक विजेता गुजर रहा हो।

कलेक्टर साहब और SP साहब का प्रशासनिक इकबाल इस कदर लाचार नजर आता है कि पुलिस की गश्ती गाड़ियां निकलने से पहले कबाड़ माफिया के ‘लाइनमैन’ को पता चल जाता है कि आज साहब का मूड कैसा है। यह कानून का राज है या कबाड़ राज का कानून?

‘बुलडोजर’ सिर्फ गरीबों के आशियाने के लिए है क्या?

आज शहडोल संभाग की जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। सरकार का ‘बुलडोजर’ जब छोटे-मोटे अपराधियों के अवैध कब्जों पर चलता है, तो खूब ढोल पीटे जाते हैं। लेकिन जब कानून के सीने को छलनी करते हुए कबाड़ माफिया का यह ‘ग्रीन कॉरिडोर’ पिछले कई सालों से लगातार दौड़ रहा है, तो सरकार का वो ‘कानूनी बुलडोजर’ पंचर क्यों हो जाता है?

यदि शहडोल पुलिस के आला हुक्मरान, जिला कलेक्टर और भोपाल में बैठे नीति-नियंताओं में जरा भी प्रशासनिक गैरत बची है, तो इस रूट मैप को ट्रेस करें, ‘कोड वर्ड’ वाले चेहरों को बेनकाब करें और इस सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करें। वर्ना जनता यह मान चुकी है कि इस ‘काले खेल’ के असली खिलाड़ी सिर्फ वो कबाड़ चोर नहीं, बल्कि कुर्सी पर बैठे ये तमाम ‘माननीय और साहब’ ही हैं।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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