शहडोल। जिले में जल गंगा संवर्धन अभियान के समापन अवसर पर प्रशासन ने उपलब्धियों का लंबा-चौड़ा ब्यौरा प्रस्तुत किया। दावा किया गया कि जिले ने राष्ट्रीय स्तर पर नौवां स्थान प्राप्त किया है तथा अभियान के अंतर्गत 163.11 करोड़ रुपये की लागत से 4,885 जल संरक्षण संबंधी कार्य पूर्ण किए गए हैं। हालांकि इन दावों के साथ ही अब इन कार्यों की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
प्रशासन के अनुसार अभियान के तहत 2,610 खेत तालाबों का निर्माण, 541 डगवेल रिचार्ज एवं रिचार्ज पिट, 302 पौधरोपण एवं गैप फिलिंग कार्य तथा लगभग 55 हजार प्लास्टिक बोतलों के माध्यम से ड्रिप सिंचाई जैसी गतिविधियां संचालित की गईं। अधिकारियों ने इसे जनभागीदारी और प्रभावी मॉनिटरिंग का परिणाम बताया।
वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का कहना है कि इन दावों का वास्तविक मूल्यांकन जरूरी है। उनका तर्क है कि यदि गर्मी के मौसम में इन खेत तालाबों, रिचार्ज संरचनाओं और जल संरक्षण कार्यों का स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया जाए, तभी यह स्पष्ट होगा कि इनसे भूजल स्तर और पेयजल संकट में कितना सुधार हुआ है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी भी जल संरक्षण अभियान की सफलता केवल निर्माण कार्यों की संख्या या खर्च की गई राशि से नहीं, बल्कि उसके स्थायी परिणामों से आंकी जानी चाहिए। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट और टैंकरों पर निर्भरता बनी रहती है, तो योजनाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
अभियान के दौरान प्लास्टिक की बेकार बोतलों से ड्रिप सिंचाई का प्रयोग भी चर्चा का विषय बना हुआ है। समर्थक इसे कम लागत वाला नवाचार बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता और स्थायित्व का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है।
इधर जागरूक नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे अभियान की सूचना का अधिकार के माध्यम से जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि सभी कार्यों की जियो-टैग लोकेशन, व्यय का विवरण, भुगतान संबंधी रिकॉर्ड तथा सोशल ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि खर्च की गई राशि का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक पहुंचा या नहीं।
जल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि अभियान के दावे वास्तविक हैं तो उनका सत्यापन भी सार्वजनिक रूप से होना चाहिए, और यदि कहीं अनियमितता है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए। आखिरकार, किसी भी जल संरक्षण अभियान की सबसे बड़ी सफलता रैंकिंग नहीं, बल्कि आम लोगों तक पानी की उपलब्धता है।
Author: सुभाष गौतम
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