स्वास्थ्य या कारोबार? निजी अस्पतालों की बाढ़, बदहाल मेडिकल कॉलेज और व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

शहडोल। शहडोल संभाग, जहां अधिकांश आबादी ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों से आती है, वहां स्वास्थ्य सेवाएं आज सबसे बड़ा प्रश्न बन चुकी हैं। एक ओर करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज है, जिसे पूरे संभाग के लिए आधुनिक चिकित्सा का केंद्र माना गया था। दूसरी ओर शहर में पिछले कुछ वर्षों में निजी अस्पतालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का संकेत है या सरकारी व्यवस्था की कमजोरियों का परिणाम?

मेडिकल कॉलेज, उम्मीदें बड़ी, सुविधाएं अधूरी?

 संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल से विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, उपकरणों की अनुपलब्धता और गंभीर मरीजों को जबलपुर, बिलासपुर, नागपुर जैसे शहरों में रेफर किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी मरीजों को बाहर जाना पड़ रहा है, तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न है।

क्या सरकारी कमजोरी से निजी अस्पतालों को मिला विस्तार?

 स्थानीय नागरिकों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों पर घटते भरोसे ने निजी अस्पतालों के लिए बड़ा अवसर तैयार किया। आज कई निजी अस्पताल अत्याधुनिक सुविधाओं का दावा करते हैं, लेकिन इलाज का खर्च सामान्य परिवार की पहुंच से बाहर बताया जाता है।

आयुष्मान भारत योजना, कागजों में मुफ्त, जमीन पर शिकायतें

 आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को पांच लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद कई लाभार्थियों की ओर से आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ निजी अस्पतालों में भर्ती, ऑपरेशन या इलाज शुरू करने से पहले कथित “सुविधा शुल्क” या अतिरिक्त राशि मांगी जाती है। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह योजना की भावना के विपरीत है।

इलाज या अनावश्यक जांच?

 कुछ मरीजों और परिजनों ने यह भी आरोप लगाए हैं कि जरूरत से अधिक पैथोलॉजी जांच, महंगी दवाएं और अतिरिक्त प्रक्रियाएं सुझाई जाती हैं, जिससे इलाज का खर्च बढ़ जाता है। 

पार्किंग नहीं, सड़कें बनीं अस्पतालों का परिसर

 शहर के कई निजी अस्पतालों में पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था न होने के कारण वाहन मुख्य मार्गों पर खड़े किए जाते हैं। इससे एम्बुलेंस तक को रास्ता मिलने में कठिनाई होती है और यातायात बाधित होता है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अस्पताल संचालन की अनुमति देते समय भवन, पार्किंग और सुरक्षा संबंधी मानकों का पालन किस स्तर पर जांचा गया।

 क्या सभी अस्पताल नियमानुसार संचालित हो रहे हैं?

 जनचर्चाओं में समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या सभी निजी अस्पतालों के पास आवश्यक पंजीयन, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र, बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन, भवन अनुमति, पार्किंग, उपकरणों और अन्य वैधानिक मानकों का नियमित सत्यापन किया जाता है। यदि नहीं, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी विषय है।

निगरानी तंत्र कितना सक्रिय?

स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन, नगर पालिका, प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े विभाग और अन्य नियामक एजेंसियों की भूमिका भी चर्चा का विषय है। यदि नियमित निरीक्षण, ऑडिट और मानकों का पालन प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जाए, तो मरीजों की शिकायतों में कमी लाई जा सकती है।

कुछ उठते सवाल

करोड़ों की लागत वाला मेडिकल कॉलेज आज भी पूर्ण क्षमता से क्यों नहीं चल पा रहा?

कितने मरीज हर महीने बाहर रेफर किए जा रहे हैं और क्यों?

निजी अस्पतालों की फीस और पैकेज का ऑडिट कब होगा?

 आयुष्मान भारत योजना में कथित अतिरिक्त वसूली की शिकायतों की जांच कौन करेगा?

क्या सभी निजी अस्पताल निर्धारित वैधानिक मानकों का पालन कर रहे हैं?

अस्पतालों की पार्किंग, अग्नि सुरक्षा, बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन और भवन संबंधी नियमों की आखिरी बार जांच कब हुई?

यदि कहीं अनियमितताएं मिलती हैं, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

स्वास्थ्य सेवा कोई सामान्य व्यवसाय नहीं, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक दायित्व से जुड़ा क्षेत्र है। इसलिए सरकारी अस्पतालों को संसाधन, विशेषज्ञ चिकित्सक और जवाबदेह प्रबंधन उपलब्ध कराना उतना ही आवश्यक है, जितना निजी अस्पतालों की पारदर्शी और नियमित निगरानी। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन, अवैध वसूली या मरीजों के अधिकारों का हनन हो रहा है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और विधिसम्मत कार्रवाई जनहित में आवश्यक है। तभी शहडोल संभाग के गरीब, ग्रामीण और आदिवासी परिवारों को सम्मानजनक, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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