शहडोल। जिले में विकास कार्यों में पारदर्शिता लाने और शासकीय योजनाओं में भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को किस तरह दबाव में लेने की कोशिश की जाती है, इसका एक ताजा उदाहरण हालिया घटनाक्रम में देखने को मिल रहा है। जिला सरपंच संघ द्वारा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के खिलाफ खोला गया मोर्चा और एक सप्ताह के भीतर स्थानांतरण का अल्टीमेटम, प्रशासनिक हलकों में एक सोची-समझी दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
प्रथम दृष्टया यह मामला भले ही एक महिला सरपंच से ‘कथित अभद्र व्यवहार’ का दिखाई दे रहा हो, लेकिन विभागीय सूत्रों और जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो कहानी कुछ और ही बयां करती है। यह पूरी कवायद एक ईमानदार और कड़क अधिकारी पर दबाव बनाने का खेल नजर आती है, ताकि वे रसूखदारों की मनमानी और अनुचित मांगों के आगे घुटने टेक दें।
नियमों के पालन की जिद या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा?
सोहागपुर जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत बोडरी में पिछले कुछ महीनों से सचिव का पद रिक्त होने की बात कही जा रही है जो सही नहीं है। नियमों के मुताबिक, किसी भी पंचायत में सचिव की नियुक्ति या प्रभार सौंपना एक पूर्णतः प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो तय मापदंडों के आधार पर होती है।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि इस मामले में संगठन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी पसंद के सचिव को प्रभार दिलाने के लिए लगातार अनुचित पैरवी की जा रही थी। जब जिला पंचायत सीईओ ने नियमों से समझौता करने और किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता की संभावना को प्रश्रय देने से साफ इनकार कर दिया, तो इस प्रशासनिक दृढ़ता को ‘अहंकार’ और ‘अभद्र व्यवहार’ का नाम देकर तूल दे दिया गया।
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति से खलबली
पिछले कुछ समय से जिला पंचायत शहडोल के अंतर्गत निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, मनरेगा, और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं की कड़ाई से मॉनिटरिंग की जा रही है।
धरातल पर काम न करने वाले और शासकीय राशि का दुरुपयोग करने वाले उपयंत्रियों, सचिवों और रोजगार सहायकों पर लगातार कार्यवाही की जा है।
अपात्रों को लाभ देने और निर्माण कार्यों में लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ रिकवरी और निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई की जा रही है।
जाहिर है, जब व्यवस्था में वर्षों से जमे ढर्रे और भ्रष्टाचार के सिंडिकेट पर चोट लगती है, तो तिलमिलाहट होना स्वाभाविक है। अपनी कमियों को छिपाने और भविष्य की जांच की आंच से बचने के लिए ‘आदिवासी कार्ड’ और ‘जनप्रतिनिधि के अपमान’ जैसे संवेदनशील मुद्दों को ढाल बनाया जा रहा है ताकि अधिकारी बैकफुट पर आ जाएं।
अधिकारियों का मनोबल गिराने की साजिश?
यदि हर नियम सम्मत बात कहने या अनुचित मांगों को ठुकराने वाले अधिकारी के खिलाफ इसी तरह लामबंदी करके काम बंद करने की धमकी दी जाएगी, तो कोई भी लोकसेवक निष्पक्षता और निडरता से काम नहीं कर पाएगा। सरपंच संघ द्वारा सीधे काम बंद करने और धरने पर बैठने की चेतावनी देना सीधे तौर पर विकास कार्यों को बंधक बनाने जैसा है, जिससे अंततः ग्रामीण जनता का ही नुकसान होगा।
बड़ा सवाल?
कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन के बाद अब गेंद जिला प्रशासन और सरकार के पाले में है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन एक नियमबद्ध तरीके से काम करने वाले अधिकारी के साथ खड़ा होगा, या फिर इस संगठित राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेक कर व्यवस्था को रसूखदारों के हवाले कर देगा? क्या वाकई यह स्वाभिमान की लड़ाई है, या फिर ईमानदारी का गला घोंटने की एक सुनियोजित कोशिश?










