शहडोल। साल 2025 का सूरज आज अपनी आखिरी किरणें बिखेर कर विदा हो रहा है। कैलेंडर बदल रहा है, तारीखें बदल रही हैं, लेकिन शहडोल संसदीय क्षेत्र और जिले की जनता की तकदीर और तस्वीरें कब बदलेंगी? यह सवाल आज हर आम जन की जुबां पर है। शासन और प्रशासन के गलियारों में बैठे चेहरों से जनता को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
सांसद हिमाद्रि सिंह; संसद में चुप्पी या क्षेत्र की सुध?
संसदीय क्षेत्र की कमान संभाल रहीं हिमाद्रि सिंह से जनता को अपेक्षा थी कि वे दिल्ली के गलियारों में शहडोल की समस्याओं की गूंज पहुंचाएंगी। लेकिन सवाल खड़ा है कि क्या वे वाकई जनता की तकलीफों और मांगों को लेकर गंभीर हैं? क्या 2026 में वे केवल रस्मी दौरों से बाहर निकलकर जनता के बीच सक्रिय होंगी, या उनकी आवाज संसद में केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित रहेगी?
विधायकों का रिपोर्ट कार्ड:; फोटोबाजी या धरातल पर काम?
जिले के तीन विधानसभा क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों पर जनता का आक्रोश साफ झलक रहा है।
ब्यौहारी विधायक शरद कोल; क्षेत्र में चर्चा है कि विधायक जी ‘अपनी डफली, अपना राग’ अलापने में मशगूल हैं। जनता की सुनने के बजाय अपनी प्राथमिकताओं को थोपना क्या उनके राजनीतिक भविष्य के लिए सही होगा?
जयसिंहनगर विधायक मनीषा सिंह; यहाँ सवाल ‘जमीनी नेतृत्व’ पर है। क्या विधायक की सक्रियता सिर्फ बैठकों और सोशल मीडिया की फोटो तक सीमित रहेगी? क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि फैसले ‘पति देव’ लेते हैं। जनता पूछ रही है- असली विधायक कब सामने आएंगी?
जैतपुर विधायक जयसिंह मरावी:; पूर्व मंत्री और अनुभवी चेहरा होने के बावजूद, मरावी जी का ‘पुराना अंदाज’ अब जनता को रास नहीं आ रहा। अनुभव का लाभ क्षेत्र को क्यों नहीं मिल रहा? क्या वे केवल पार्टी के नाम पर जीतने वाले नेता बनकर रह जाएंगे?
प्रशासनिक सुस्ती: कलेक्टर डॉ. केदार सिंह और ‘नाम बड़े दर्शन छोटे’
जिला कलेक्टर डॉ. केदार सिंह के कार्यकाल को लेकर जिले में असंतोष की लहर है। आरोप है कि कामकाज सिर्फ ऊपर से मिले निर्देशों के पालन तक सीमित है। कोई नई उपलब्धि या नवाचार जिले में नजर नहीं आया।
साहब से सवाल। भ्रष्टाचार के मामले जब राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहे हैं, तब भी जिले में किसी बड़ी कार्रवाई का अभाव क्यों है? खास लोगों से नजदीकी और फोटो खिंचाने के शौक के बीच, आम जनता के काम और भ्रष्टाचार पर लगाम ‘सिफर’ क्यों है?
पुलिसिया इकबाल पर सवाल; एसपी रामजी श्रीवास्तव और ‘अवैध’ का बोलबाला
शुरुआत में पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव ने शिकायतकर्ताओं के लिए रजिस्टर और फोन पर संवाद जैसी पहल की थी, जो अब ठंडे बस्ते में नजर आती है।
अपराध का ग्राफ। जिले में चोरी की घटनाएं आम हो चुकी हैं।
अवैध कारोबार। अवैध खनन और नशीले पदार्थों का अवैध कारोबार हर थाना क्षेत्र में ‘शबाब’ पर है।
कार्यवाही का अभाव। रात्रि गश्त और अपराधियों की धरपकड़ न के बराबर है। पुलिस बल की कार्यप्रणाली खुद शंका के घेरे में है। सवाल यह है कि ये सब किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है?
2026 में क्या बदलेगा?
2025 का अंत शहडोल के लिए कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़कर जा रहा है। क्या जनप्रतिनिधि आत्ममंथन करेंगे? क्या प्रशासन केवल कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय जमीन पर उतरेगा? शहडोल की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है।











