भोपाल। स्वागत कीजिए उस नए प्रदेश का, जहाँ विकास अब गिट्टी, पत्थर और डामर से नहीं, बल्कि मेगापिक्सल और लाइटिंग से नापा जाता है। अगर आप सोच रहे हैं कि सरकार ‘जनता’ चला रही है, तो आप गलत हैं। सरकार तो ‘इमेज मैनेजमेंट’ वाली एजेंसियां और साहब के पीछे ‘जी हुजूर’ करने वाले दरबारी चला रहे हैं।
’तबादला उद्योग’ और फाइलों का ‘फेयरवेल’
पूरे प्रदेश में एक ही उद्योग सबसे ज्यादा मुनाफा दे रहा है— तबादला उद्योग। यहाँ पोस्टिंग मेरिट पर नहीं, बल्कि ‘समर्पण’ और ‘समीकरण’ पर होती है।
मलाईदार पद
यहाँ ‘मलाई’ का मतलब दूध से नहीं, बल्कि खनिज और राजस्व की उन फाइलों से है जिन्हें दबाने के लिए ‘खास’ हुनर चाहिए।
साहब का खौफ
किसी भ्रष्टाचारी को जेल भेजने का डर अब पुराना हो गया है, अब तो बस ‘लूप लाइन’ में फेंके जाने का डर ही साहब को ईमानदार दिखने पर मजबूर करता है।
खनिज का ‘मौन व्रत’ और राजस्व का ‘चमत्कार’
नदियों का सीना चीरती मशीनें हों या आदिवासियों की जमीन पर कब्जा, प्रशासन ने एक अद्भुत ‘योग’ सीख लिया है— आँखें मूँदकर सब कुछ देखना।
“जब रेत से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली निकलती है, तो साहब को उसमें ‘विकास का रथ’ नजर आता है, और जब गरीब अपनी जमीन के लिए गुहार लगाता है, तो साहब को ‘सर्वर डाउन’ होने का बहाना मिल जाता है।”
राजधानी से जिलों तक, ‘दरबारी’ पत्रकारों का जाल
अब पत्रकारिता ‘मिशन’ से ‘कमीशन’ की ओर बढ़ चुकी है। जिले में बैठा ‘फोटोबाज’ पत्रकार अगर साहब की आरती उतारता है, तो राजधानी में बैठा उसका आका उस आरती को ‘प्रदेश व्यापी उपलब्धि’ का जामा पहना देता है।
हेडलाइन का खेल
खबर अब वह नहीं है जो घट रही है, खबर वह है जो साहब को ‘हैंडसम’ और ‘मसीहा’ दिखाए।
क्रिटिकल थिंकिंग का अंत
सवाल पूछने वाले को ‘सिस्टम का दुश्मन’ घोषित कर दिया जाता है, जबकि तलवे चाटने वालों को ‘अंगवस्त्र’ और ‘सम्मान’ से नवाजा जाता है।
स्कूलों की छतें टपक रही हैं, लेकिन ‘शिक्षा क्रांति’ के पोस्टरों की चमक आँखों को चौंधिया रही है।
यह ‘अंधेर नगरी’ अब किसी एक शहर की जागीर नहीं रही। जब ‘कलेक्टर कवच’ और ‘मंत्रालय की मेहरबानी’ मिल जाते हैं, तो भ्रष्टाचार केवल एक अपराध नहीं, बल्कि एक ‘लाइफस्टाइल’ बन जाता है। जनता तो बस उस ‘सेल्फी’ का बैकग्राउंड है, जिसे साहब अपनी सफलता के तौर पर दुनिया को दिखा रहे हैं।
Author: सुभाष गौतम
जनहित के लिए बुलंद आवाज











