नैतिकता का ‘पेंट’ और व्यवस्था की ‘सफेदी’

शहडोल। 31 जनवरी 2026 की शाम जब ढल रही थी, तो वह सिर्फ एक सरकारी अधिकारी, फूल सिंह मरपाची की सेवानिवृत्ति की शाम नहीं थी, वह शहडोल की प्रशासनिक शुचिता और जवाबदेही के ‘अंतिम संस्कार’ की भी शाम थी। करोड़ों के बहुचर्चित पेंट घोटाले के मुख्य सूत्रधार माने जाने वाले अधिकारी को जिस तरह ‘गरिमामयी’ विदाई दी गई, उसने यह सिद्ध कर दिया कि हमारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार कोई ‘अपराध’ नहीं, बल्कि एक ‘कला’ है—और इस कला के पारखी खुद वे अधिकारी हैं, जिन्हें इसकी जांच का जिम्मा सौंपा गया था।

जांचकर्ता या ‘चीयरलीडर्स’?

इतिहास में शायद ही ऐसे उदाहरण मिलते हों, जहाँ मुजरिम के गले में फूल माला डालने वाले वही लोग हों, जिनके हाथों में उसकी जांच की फाइलें दफन हों। विदाई समारोह में जांच टीम के सदस्यों की मौजूदगी ने एक स्पष्ट संदेश दिया है: “हम साथ-साथ थे, हम साथ-साथ हैं।” जब जांच करने वाले ही बधाई देने वालों की कतार में सबसे आगे खड़े हों, तो समझ लेना चाहिए कि जांच की आंच कितनी ठंडी थी। यह विदाई नहीं, बल्कि उस ‘मौन समझौते’ का जश्न था, जिसके तहत करोड़ों रुपये के गबन को फाइलों के मलबे में सफलतापूर्वक दबा दिया गया।

 विडंबना देखिए, जिन दीवारों पर पुताई के नाम पर करोड़ों डकारे गए, वे दीवारें आज भी बदरंग हैं, लेकिन उस घोटाले के चेहरे को प्रशासन ने ‘सफेदी’ लगाकर ऐसा चमकाया कि जनसंपर्क विभाग ने बाकायदा प्रेस नोट जारी कर अपनी पीठ थपथपा ली।

भ्रष्टाचार का ‘वैधीकरण’ 

शहडोल का पेंट घोटाला महज आंकड़ों की बाजीगरी नहीं थी। यह उन बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ था, जिनके स्कूलों की सूरत बदलने के नाम पर कागजों पर कूचियां चलाई गईं। राष्ट्रीय मीडिया में 15 दिनों तक जिले की किरकिरी होना प्रशासन के लिए शर्म का विषय होना चाहिए था, लेकिन 31 जनवरी के जश्न ने उसे ‘शौर्य गाथा’ में बदल दिया। जब जनसंपर्क विभाग एक दागी कार्यकाल की समाप्ति को “ऐतिहासिक और गरिमामयी” बताता है, तो वह अनजाने में ही भ्रष्टाचार को ‘संस्थागत मान्यता’ दे रहा होता है।

सवाल जो अनुत्तरित रहेंगे

 क्या विदाई समारोह के फूलों की खुशबू उन स्कूलों की सीलन भरी दीवारों की बदबू को दबा पाएगी, जहाँ कभी पेंट पहुंचा ही नहीं?

  क्या उन जांच अधिकारियों की अंतरात्मा ने उन्हें कचोटा नहीं, जो कल तक ‘साक्ष्य’ ढूंढ रहे थे और आज ‘स्मृति चिह्न’ भेंट कर रहे थे?

 क्या यह विदाई उन ईमानदार कर्मचारियों के गाल पर तमाचा नहीं है, जो पूरी सेवा में एक बेदाग छवि के लिए संघर्ष करते हैं?

शहडोल के इस ‘महान विदाई कांड’ ने यह साबित कर दिया है कि यदि आपके पास ‘सही’ रसूख और ‘सही’ साथी हैं, तो आप सिस्टम को अपनी धुन पर नचा सकते हैं। फूल सिंह मरपाची तो विदा हो गए, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसा खतरनाक नजीर छोड़ गए हैं, जो आने वाले समय में हर भ्रष्ट अधिकारी को यह हौसला देगा कि— “घोटाला चाहे जितना बड़ा हो, अंत में फूल और मालाएं ही मिलेंगी।”

31 जनवरी वाकई ऐतिहासिक था—इसलिए नहीं कि कोई अधिकारी रिटायर हुआ, बल्कि इसलिए क्योंकि उस दिन भ्रष्टाचार ने अपनी जीत का सरेआम ढोल बजाया।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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