पंडित शंभूनाथ विश्वविद्यालय में पीएचडी या ‘डिग्री का खेल’?

शहडोल। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शोध को सबसे पवित्र और कठिन प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय से छन कर आ रही खबरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। चर्चा है कि यहाँ पीएचडी शोध नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ के सहारे डिग्री बाँटने का खेल चल रहा है।

गाइड का संकट,केवल दो रेगुलर HoD के भरोसे शोध?

UGC के नियमों के अनुसार, एक पीएचडी गाइड बनने के लिए प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर या असिस्टेंट प्रोफेसर का नियमित होना अनिवार्य है।

 एक प्रोफेसर अधिकतम 8, एसोसिएट प्रोफेसर 6 और असिस्टेंट प्रोफेसर 4 शोधार्थियों को गाइड कर सकते हैं।

 यदि विश्वविद्यालय में केवल दो ही नियमित विभागाध्यक्ष हैं, तो सैकड़ों छात्रों का पंजीयन किस आधार पर किया गया? क्या गेस्ट फैकल्टी या अनुबंध वाले शिक्षकों को अवैध रूप से गाइड बनाया गया है? यह सीधा-सीधा नियमों का उल्लंघन है।

सूत्रों के अनुसार यूनिवर्सिटी और इसके अधीन महाविद्यालय में पदस्थ रसायन शास्त्र विषय में यूनिवर्सिटी में दो नियमित प्रोफेसर हैं इसके अलावा बुढार 01, कोतमा 01, राजेन्द्रग्राम 01 और अनूपपुर में 01, कुल लगभग 06 प्रोफेसर है शोध केंद्र केवल एक यूनिवर्सिटी ही है।

 लैब के बिना कैसा ‘साइंटिफिक’ शोध?

विज्ञान और तकनीकी विषयों में शोध बिना प्रयोगशाला के संभव ही नहीं है।

 सूत्रों का दावा है कि विश्वविद्यालय में अत्याधुनिक लैब सुविधाओं का अभाव है। बिना प्रैक्टिकल और डेटा वेरिफिकेशन के शोधार्थी अपनी थीसिस कैसे तैयार कर रहे हैं? क्या यह डेटा केवल कागजों पर ‘कॉपी-पेस्ट’ किया जा रहा है?

‘दोहरी भूमिका’ का खेल, नौकरी भी और फुल-टाइम पीएचडी भी?

सबसे चौंकाने वाला पहलू उन शोधार्थियों का है जो कहीं और पूर्णकालिक कर्मचारी के रूप में वेतन उठा रहे हैं और यहाँ पीएचडी भी कर रहे हैं।

पीएचडी के लिए 200 दिनों की उपस्थिति और कोर्स वर्क अनिवार्य है।

 जो व्यक्ति सरकारी या निजी संस्थान में 10 से 5 की ड्यूटी कर रहा है, वह विश्वविद्यालय की लैब या लाइब्रेरी में अपना समय कैसे दे रहा है? क्या उनकी उपस्थिति फर्जी तरीके से लगाई जा रही है? बिना ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ और लीव के नौकरी के साथ रेगुलर पीएचडी करना कानूनी रूप से गलत है।

200 दिन की अनिवार्यता का उल्लंघन

यूजीसी के नए नियमों के तहत शोधार्थी को शोध केंद्र पर सक्रिय उपस्थिति दर्ज करानी होती है। यदि छात्र कैंपस आ ही नहीं रहे हैं, तो उनके शोध की प्रोग्रेस रिपोर्ट कौन और कैसे साइन कर रहा है?

 प्रबंधन पर उठते सवाल

पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय प्रशासन को इन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण देना चाहिए

 1. विश्वविद्यालय में कुल कितने नियमित गाइड हैं और उनके अंडर कितने छात्र पंजीकृत हैं?

 2. क्या नौकरी पेशा छात्रों के पास संबंधित विभाग से अनुमति NOC है?

 3. बिना पर्याप्त लैब संसाधनों के साइंस विषयों के शोध को मान्यता कैसे दी जा रही है?

इस पूरे मामले पर विश्वविद्यालय प्रबंधन की चुप्पी कहीं न कहीं इन ‘सुगबुगाहटों’ को बल दे रही है। यदि समय रहते उच्च शिक्षा विभाग ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो यहाँ से निकलने वाली डिग्रियां महज रद्दी का टुकड़ा बनकर रह जाएंगी।

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