शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग का प्रतिष्ठित पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय इन दिनों अपनी शैक्षणिक उपलब्धियों के बजाय गंभीर विवादों और प्रशासनिक कुप्रबंधन को लेकर सुर्खियों में है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही शिकायतों और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों ने विश्वविद्यालय के कामकाज पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
करोड़ों का बजट, पर परिणाम शून्य?
दावा किया जा रहा है कि सरकार द्वारा विश्वविद्यालय के विकास के लिए भारी-भरकम बजट आवंटित किए जाने के बावजूद, संस्थान की स्थिति दयनीय बनी हुई है। बुनियादी ढांचे और शैक्षणिक गुणवत्ता के अभाव के कारण यह विश्वविद्यालय नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क की सूची में अपनी जगह बनाने में पूरी तरह विफल रहा है। शिक्षाविदों का कहना है कि जहां अन्य नए संस्थान राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं, वहीं PTSNS अपनी आंतरिक गुटबाजी और कुप्रबंधन में उलझा हुआ है।
विवादों के केंद्र में ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’ और धांधली
विश्वविद्यालय के भीतर से आ रही खबरें एक ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’ की ओर इशारा करती हैं। सूत्रों और सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार, संस्थान में प्रशासनिक कदाचार चरम पर है। कर्मचारियों और प्राध्यापकों के बीच भय का माहौल है, जिससे शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो रहा है।
UGC नियमों की अनदेखी
आरोप है कि नियुक्तियों, पदोन्नति और शैक्षणिक संचालन में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनिवार्य दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन किया जा रहा है।
निधि का दुरुपयोग
सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता की कमी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बजट का बड़ा हिस्सा विकास के बजाय अनावश्यक कार्यों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।
NIRF रैंकिंग से दूरी
डेटा की कमी और खराब शैक्षणिक प्रदर्शन के कारण विश्वविद्यालय राष्ट्रीय रैंकिंग में कहीं नहीं टिकता, जो यहां के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसा है।
छात्रों और अभिभावकों में आक्रोश
शहडोल के स्थानीय निवासियों और छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय को एक मॉडल संस्थान बनना था, लेकिन यह केवल ‘राजनीति का अखाड़ा’ बनकर रह गया है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो और दस्तावेजों में विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया गया है।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने मांग की है कि राज्य शासन और राजभवन को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। विश्वविद्यालय के वित्तीय ऑडिट के साथ-साथ UGC के नियमों के पालन की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन होना अनिवार्य है, ताकि इस प्रतिष्ठित संस्थान की गरिमा को बचाया जा सके।
यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने वाला एक केंद्र बनकर रह जाएगा, जबकि इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्रदान करना था।











