शहडोल। देश और प्रदेश में उच्च शिक्षा का स्तर सुधारने और छात्र-छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शहडोल संभाग में केवल ‘कागजी कोरम’ बनकर रह गई है। नीति के तहत छात्र-छात्राओं के कौशल विकास के लिए
डिजिटल मार्केटिंग, व्यक्तित्व विकास, पर्यटन, मेडिसिनल प्लांट्स और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट जैसे बेहद तकनीकी व व्यावहारिक वोकेशनल कोर्स शुरू तो कर दिए गए, लेकिन इन्हें पढ़ाने और परीक्षा लेने के लिए ‘विशेषज्ञों’ के बजाय कॉलेज प्रशासन और विश्वविद्यालय रामभरोसे काम चला रहे हैं।
उमरिया कॉलेज का हाल,राजनीति के शिक्षक निखार रहे ‘व्यक्तित्व’, सोशियोलॉजी वाले घुमा रहे ‘पर्यटन’
नियमों के मुताबिक, इन व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए कॉलेजों को बाहरी विषय विशेषज्ञों को आमंत्रित कर अध्यापन और प्रायोगिक कार्य करवाना चाहिए, ताकि छात्रों को जमीनी और तकनीकी ज्ञान मिल सके। परंतु जमीनी हकीकत इसके उलट है।
उदाहरण के तौर पर, उमरिया शासकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के शिक्षक को ‘व्यक्तित्व विकास’ की कक्षाएं थमा दी गई हैं।
समाजशास्त्र के शिक्षक को ‘पर्यटन’ का जिम्मा सौंप दिया गया है।
हद तो तब हो गई जब सांख्यिकी और भूगर्भ शास्त्र के शिक्षकों को ‘डिजिटल मार्केटिंग’ जैसी हाई-टेक क्लास आवंटित कर दी गई।
यह विडंबना सिर्फ एक कॉलेज की नहीं, बल्कि शहडोल संभाग के अधिकांश शासकीय महाविद्यालयों की है, जहां बजट बचाने या इच्छाशक्ति की कमी के कारण केवल कोरम पूरा किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय का अजूबा, बॉटनी के प्रोफेसर ‘डिजिटल मार्केटिंग’ के एक्सटर्नल एग्जामिनर!
कक्षाओं की अव्यवस्था तो एक पहलू है, लेकिन पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय शहडोल द्वारा प्रायोगिक परीक्षाओं के लिए नियुक्त किए गए बाह्य परीक्षकों की सूची देखकर सिर चकरा जाएगा।
विश्वविद्यालय ने योग्यता और विषय की प्रासंगिकता को ताक पर रखकर ऐसे समन्वय किए हैं जो शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े करते हैं।
बॉटनी के सहायक प्राध्यापक को ‘व्यक्तित्व विकास’ और ‘डिजिटल मार्केटिंग’ जैसी तकनीकी परीक्षाओं का ‘एक्सटर्नल एग्जामिनर’ बनाकर भेज दिया गया।
इसी तरह, वाणिज्य विषय के शिक्षक ‘पर्यटन’ विषय की प्रैक्टिकल परीक्षा न सिर्फ ले रहे हैं, बल्कि नंबर भी बांट रहे हैं।
बड़ा सवाल, जो शिक्षक खुद उस विषय की पृष्ठभूमि से नहीं है, वह छात्र-छात्राओं के तकनीकी ज्ञान और प्रायोगिक कौशल का मूल्यांकन किस पैमाने पर कर रहा होगा? यह सीधे तौर पर विद्यार्थियों के भविष्य और उनकी डिग्री की विश्वसनीयता के साथ खिलवाड़ है।
उच्च शिक्षा विभाग और जिम्मेदार मौन, संज्ञान की जरूरत
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य छात्रों को रोजगार के लिए तैयार करना है। लेकिन जब सिखाने वाले और परीक्षा लेने वाले ही उस विषय से अनभिज्ञ होंगे, तो डिग्रियां महज कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएंगी।
संभाग के जागरूक नागरिकों और छात्र संगठनों का कहना है कि उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और राजभवन को इस घोर लापरवाही पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। क्या विश्वविद्यालय और कॉलेज प्रशासन इसी ‘जुगाड़ तंत्र’ के भरोसे आत्मनिर्भर भारत और कुशल युवा तैयार करने का दावा कर रहे हैं?










