शहडोल। मध्य प्रदेश के राजस्व विभाग की सुस्त रफ्तार से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन शहडोल जिले की गोहपारू तहसील इन दिनों अपनी “अति-सक्रियता” को लेकर विवादों के घेरे में है। मामला चुहिरी वृत्त के ग्राम बेला का है, जहां एक अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही ने न्याय की समानता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम बेला निवासी आवेदक रामदेव जायसवाल ने 30 अप्रैल 2026 को एक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप था कि एक अन्य निवासी ने शासकीय भूमि खसरा नंबर 131 पर अवैध बाउंड्री वॉल का निर्माण किया है।
हैरानी की बात यह है कि जिस राजस्व विभाग में सीमांकन और नामांतरण के लिए लोग सालों भटकते हैं, वहां
30 अप्रैल शिकायत दर्ज हुई।
06 मई नायब तहसीलदार वृत्त खन्नौधी द्वारा बेदखली और ₹10,000 जुर्माने का आदेश जारी हुआ।
18 मई मौके पर जेसीबी पहुंची और निर्माण को जमींदोज कर दिया गया।
मात्र 18 दिनों के भीतर शिकायत से लेकर विध्वंस तक का सफर तय कर लेना चर्चा का विषय बना हुआ है।
चर्चा में ’50 हजार’ का कथित खेल
ग्रामीणों और स्थानीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि इतनी तेज कार्यवाही के पीछे “प्रशासनिक निष्ठा” कम और “सुविधा शुल्क” का असर ज्यादा है। दबी जुबान में आरोप लग रहे हैं कि शिकायतकर्ता द्वारा कथित तौर पर ₹50,000 के लेनदेन के बाद ही फाइल ने इतनी तेजी से पंख लगाए।
यदि प्रशासन इतना ही मुस्तैद है, तो उसी ग्राम और वृत्त में अन्य रसूखदारों द्वारा किए गए अवैध कब्जों पर प्रशासन की जेसीबी “पंचर” क्यों हो जाती है?
पटवारियों की कार्यप्रणाली से जनता त्रस्त
एक तरफ जहां इस त्वरित कार्यवाही ने लोगों को चौंकाया है, वहीं दूसरी ओर आम जनता पटवारियों के ढुलमुल रवैये से परेशान है। आम आदमी के जायज कामों के लिए पटवारी महीनों चक्कर लगवाते हैं, लेकिन इस विशेष मामले में जिस तरह की ‘तत्परता’ दिखाई गई, उसने तहसील कार्यालय की निष्पक्षता को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है।
अतिक्रमण हटना गलत नहीं है, लेकिन “चुनिंदा कार्यवाही” की नीति न्यायसंगत नहीं कही जा सकती। यदि प्रशासन इसी तेजी से तहसील के अन्य सभी अतिक्रमण हटा दे, तो शायद जनता का भरोसा लौट आए। फिलहाल, बेला की यह ध्वस्त बाउंड्री गोहपारू तहसील की कार्यप्रणाली पर कई “अवैध” सवाल खड़े कर रही है।










