शहडोल। जिले के बुढार थाना क्षेत्र में इन दिनों एक तथाकथित कबाड़ माफिया का साम्राज्य चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा इसलिए नहीं कि उसका कारोबार बड़ा है, बल्कि इसलिए कि उसका ‘नेटवर्क’ और ‘प्रभाव’ पुलिस प्रशासन के इकबाल को चुनौती दे रहा है। क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि इस माफिया के तार ‘बड्डे -बड्डे‘ रसूखदारों से जुड़े हैं, जिसके चलते कानून के हाथ इसके गिरेबान तक पहुँचने से पहले ही ठिठक जाते हैं।
खाकी की चुप्पी और रसूख का ‘कवच’
हैरानी की बात यह है कि बुढार जैसे संवेदनशील इलाके में सक्रिय इस कबाड़ माफिया पर न तो स्थानीय थाना प्रभारी ने हाथ डाला और न ही अनुविभागीय अधिकारी स्तर से कोई ठोस कार्रवाई हुई। यहाँ तक कि जिले के पुलिस कप्तान के पास भी शायद इसकी कुंडली पहुँचने से पहले ही ‘प्रभाव’ की दीवार खड़ी कर दी जाती है। सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन सी अदृश्य शक्ति है, जिसके डर या दबाव में जिम्मेदार अधिकारी इस माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने से कतराते हैं?
SECL और रेलवे की संपत्ति पर ‘डाका’
सूत्रों की मानें तो इस माफिया का कारोबार केवल पुराने लोहे-लक्कड़ तक सीमित नहीं है। SECL की खदानों और रेलवे के महत्वपूर्ण उपकरणों व कबाड़ को खपाने का एक संगठित सिंडिकेट यहाँ फल-फूल रहा है। सरकारी संपत्तियों की यह ‘चोरी’ सरेआम हो रही है, लेकिन माल कहाँ खपाया जा रहा है और इसके मुख्य खरीदार कौन हैं, इसकी तह तक जाने की जहमत कोई नहीं उठा रहा।
जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर सवाल
जब जिले के आला अधिकारी अपराध मुक्त प्रशासन का दावा करते हैं, तो ऐसे में बुढार के इस ‘कबाड़ किंग’ का बेखौफ घूमना प्रशासन की छवि पर कालिख पोतने जैसा है। क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इस अवैध कारोबार की भनक नहीं है? या फिर ‘ऊपर’ तक पहुँचने वाला हिस्सा सबकी जुबान पर ताला जड़ चुका है?
अगर समय रहते इस “बड्डे“ नेटवर्क और कबाड़ माफिया के गठजोड़ को नहीं तोड़ा गया, तो सरकारी संपत्ति की लूट का यह सिलसिला जिले की कानून व्यवस्था को और भी खोखला कर देगा। जनता अब यह देख रही है कि जिले के ‘कप्तान’ इस रसूखदार माफिया के तिलिस्म को तोड़ते हैं या फिर यह प्रभाव ऐसे ही खाकी पर भारी पड़ता रहेगा।










