शहडोल। सोहागपुर जनपद के ग्राम पंचायत छतवई में ‘संदीपनी विद्यालय’ को लेकर जारी गतिरोध अब केवल जमीन का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक असमानता की एक दर्दनाक तस्वीर पेश कर रहा है। यहाँ प्रशासन की चुप्पी और ग्रामीणों के विरोध के बीच वह बच्चा सबसे ज्यादा पिस रहा है, जिसके पास शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
दोहरा समाज, दोहरी मार, सक्षम बनाम मजबूर
इस पूरे विवाद में एक कड़वी सच्चाई यह उभर कर आई है कि शिक्षा का अधिकार भी अब वर्ग-विभाजित हो गया है।
सक्षम वर्ग का कवच, क्षेत्र के साधन संपन्न और आर्थिक रूप से मजबूत लोग इस विवाद से बेअसर हैं। उनके बच्चे शहर के महंगे निजी स्कूलों में अपने वाहन से जा रहे हैं। उनके लिए इस विद्यालय का बनना या न बनना महज एक खबर है।
गरीब की उम्मीद
दूसरी ओर वे ग्रामीण हैं जो रोज कमाते और रोज खाते हैं। उनके बच्चों के लिए यह सरकारी स्कूल और हॉस्टल ही एकमात्र सहारा है। उनके लिए शिक्षा कोई ‘चॉइस’ नहीं, बल्कि गरीबी के कुचक्र से बाहर निकलने का इकलौता रास्ता है।
हॉस्टल के भरोसे टिकी है उम्मीदें
दूर-दराज के इलाकों से आने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चे सरकारी हॉस्टल में रहकर पढ़ाई का सपना देखते हैं। करोड़ों की लागत से बनने वाला यह संदीपनी विद्यालय इन बच्चों को आधुनिक सुविधाएं और बेहतर वातावरण दे सकता था, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता ने इन सपनों पर ‘ग्रहण’ लगा दिया है।
“क्या प्रशासन का यह ढुलमुल रवैया उन गरीब मां-बाप के साथ न्याय है, जो अपने बच्चों को कलेक्टर-कमिश्नर बनाने का सपना तो देखते हैं, लेकिन निजी स्कूलों की फीस भरने की हिम्मत नहीं रखते?”
प्रशासनिक विफलता, विकास के दावों की पोल
एक तरफ सरकार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और ‘हर बच्चा स्कूल जाए’ जैसे नारे लगाती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर एक बड़े प्रोजेक्ट को जमीन उपलब्ध न करा पाना सरकारी मशीनरी की कार्यकुशलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
मजबूरी का ढोंग, प्रशासन की ‘असहाय’ मुद्रा ने उन हजारों अभिभावकों के मन में रोष भर दिया है, जो अपने बच्चों को इसी विद्यालय में पढ़ते देखना चाहते थे।
आस्था और शिक्षा का संगम क्यों नहीं?
शासन और प्रशासन को यह समझना होगा कि आस्था और शिक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ग्रामीणों की सांस्कृतिक पहचान (मंच और भवन) को सुरक्षित रखते हुए भी विद्यालय के लिए रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन इसके लिए ‘इच्छाशक्ति’ की जरूरत है, जो फिलहाल फाइलों में दबी नजर आ रही है।
अगर जल्द ही कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो जीत किसी की भी हो, हार केवल उन गरीब बच्चों की होगी जो आज भी फटी हुई किताब और टूटी हुई स्लेट लेकर एक बेहतर भविष्य का इंतजार कर रहे हैं।
Author: सुभाष गौतम
जनहित के लिए बुलंद आवाज











