शहडोल का गांधी स्टेडियम, प्रशासनिक ‘सुस्ती’ या बड़ा ‘खेल’? 10 फरवरी को हाईकोर्ट में अंतिम जवाब का दबाव

शहडोल। शहर की खेल प्रतिभाओं का केंद्र ‘महात्मा गांधी स्टेडियम’ आज प्रशासनिक अनदेखी और कानूनी उलझनों के कारण अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। लगभग 6 दशक पुराने इस जमीन अधिग्रहण मामले में अब 10 फरवरी 2026 की तारीख निर्णायक साबित होने वाली है, जब जिला प्रशासन को हाईकोर्ट में अपना अंतिम रुख स्पष्ट करना होगा।

क्या है पूरा विवाद?

स्टेडियम के लिए अधिग्रहित की गई लगभग 4.00 एकड़ जमीन (खसरा नंबर 77, 83, 84, 86, 87, 104) को लेकर भू-स्वामी मोहम्मद खालिक व अन्य ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि, या तो अधिग्रहित की गई जमीन भू-स्वामी को वापस की जाए। या फिर वर्तमान दर पर मुआवजा दिया जाए।

बावजूद इसके, बीते 7-8 सालों में जिला प्रशासन ने कोई ठोस निर्णय नहीं लिया, जिसके परिणामस्वरूप अब मामला हाईकोर्ट में ‘अवमानना याचिका’ तक पहुँच गया है।

कृषि बनाम व्यावसायिक, मुआवजे का ‘गणित’ और ‘नीयत’

इस मामले में सबसे बड़ा पेंच मुआवजे की दर को लेकर फंसता दिख रहा है। जब जमीन अधिग्रहित की गई थी, तब वह ‘कृषि भूमि’ थी। कानूनी विशेषज्ञों और नगरवासियों के आवेदन के अनुसार, नियमानुसार वर्तमान में भी इसका मुआवजा ‘कृषि दर’ पर ही देय होना चाहिए।

   पत्र के अनुसार, कृषि दर पर यह मुआवजा लगभग 1,44,18,000 रुपये (1.44 करोड़) बनता है।

 अपुष्ट सूत्रों के हवाले से यह खबर चर्चा में है कि प्रशासन इसे ‘व्यावसायिक दर’ पर भुगतान करने की योजना बना रहा है। यदि ऐसा होता है, तो यह सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ होगा और इसमें किसी बड़े ‘सांठगांठ’ की बू आ रही है।

10 फरवरी, प्रशासन के पास दो ही रास्ते

2 फरवरी को हुई सुनवाई में प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट जवाब न मिलने पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अब 10 फरवरी को प्रशासन को यह तय करना होगा कि, क्या वह 1.44 करोड़ देकर स्टेडियम को सुरक्षित बचाएगा?

  या जमीन वापस कर शहर के एकमात्र व्यवस्थित खेल मैदान को खंडित होने देगा?

 “स्टेडियम शहर की धरोहर है। प्रशासन को चाहिए कि वह कृषि दर पर मुआवजा देकर इस विवाद को तत्काल समाप्त करे, ताकि सार्वजनिक हित और सरकारी धन दोनों की रक्षा हो सके।”

यदि समय रहते सही दर पर मुआवजे का फैसला नहीं लिया गया, तो न केवल स्टेडियम का एक बड़ा हिस्सा हाथ से निकल जाएगा, बल्कि प्रशासन को कोर्ट की भारी फटकार और अवमानना की कार्रवाई का सामना भी करना पड़ सकता है।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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