जब इलाका मूलभूत सुविधाओं, जर्जर सड़कों और बेरोजगारी से जूझ रहा हो, तब ‘वैश्विक मंच पर नाम चमकने’ के दावे केवल कागजी गुब्बारे ही नजर आते हैं।
शहडोल। सितंबर का महीना कोई ‘क्रांतिकारी’ बदलाव नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं और धरातल की हकीकत का नया नमूना लेकर आ रहा है। एक तरफ सांसद महोदया उज़्बेकिस्तान की सरकारी सैर पर रवाना हो रही हैं, तो दूसरी तरफ जनता उस ट्रेन के ठहराव का जश्न मनाने को मजबूर है, जो सालों पहले उसी से छीन ली गई थी।
डिप्लोमेसी या सरकारी खर्च पर पर्यटन?
उज़्बेकिस्तान के चार दिवसीय दौरे पर कूटनीति और ‘युवा नेतृत्व’ की दुहाई दी जा रही है। बड़ा सवाल यह है कि ताशकंद की वादियों में संसदीय मैत्री बढ़ाने से शहडोल के दूरदराज आदिवासी इलाकों की बदहाली कैसे दूर होगी? जिस क्षेत्र के अस्पताल और स्कूल खुद वेंटिलेटर पर हों, वहां के सांसद के विदेश उड़ान भरने से स्थानीय जनता की बुनियादी समस्याओं का क्या हल निकलेगा, यह समझ से परे है।
छीना गया हक वापस मिला, उसी पर थपथपा रहे अपनी पीठ
वेंकटनगर स्टेशन पर नर्मदा एक्सप्रेस के ठहराव को ऐसे परोसा जा रहा है मानो कोई नई बुलेट ट्रेन चला दी गई हो। सच तो यह है कि यह ठहराव कोरोना महामारी के बहाने सालों पहले मनमाने ढंग से छीन लिया गया था। जो सुविधा सालों से जनता का जायज हक थी, उसे इतने समय बाद केवल बहाल भर कराने पर ‘ऐतिहासिक सौगात’ का ढिंढोरा पीटना अपनी नाकामी पर परदा डालने जैसा है।
नेताजी उड़ेंगे विदेश, काम करेगी जनता
विडंबना की पराकाष्ठा तो यह है कि जिस ट्रेन के ठहराव की वाहवाही बटोरी जा रही है, उसके उद्घाटन के वक्त खुद सांसद महोदया क्षेत्र में मौजूद तक नहीं रहेंगी। 5 सितंबर को जब ट्रेन वेंकटनगर पहुंचेगी, तब सांसद जी विदेश में व्यस्त होंगी और स्थानीय जनता को खुद ही हरी झंडी दिखाकर औपचारिकता पूरी करनी पड़ेगी।












