शहडोल। केशवाही क्षेत्र में इन दिनों स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली का एक अजीबो-गरीब नजारा देखने को मिल रहा है। जहां एक तरफ प्रशिक्षित डॉक्टर और स्वास्थ्य केंद्र पस्त नजर आ रहे हैं, वहीं महज 12वीं फेल सचिन कुशवाहा के क्लिनिक के बाहर तड़के से ही मरीजों की लंबी कतारें लग रही हैं। यह स्थिति न सिर्फ चौंकाने वाली है, बल्कि जिले के स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और उसकी गहरी नींद पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सूत्रों के मुताबिक, जिले भर में बिना वैध डिग्री के प्रैक्टिस कर रहे झोलाछाप डॉक्टरों की एक समानांतर फौज तैयार हो चुकी है। ग्रामीणों की अज्ञानता और आपात स्थिति का फायदा उठाकर ये फर्जी डॉक्टर हाई-डोज एंटीबायोटिक्स और स्टेरॉयड देकर सरेआम इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहे हैं। क्षेत्रीय चर्चाओं की मानें तो इस अवैध कारोबार का बेखौफ चलना कोई इत्तेफाक नहीं है; हर महीने एक ‘तय राशि’ का लिफाफा संबंधित तंत्र तक बाकायदा पहुंच रहा है। इसी ‘मंथली’ के दम पर स्वास्थ्य विभाग ने अपनी आंख, कान और मुंह तीनों पर ताला लगा रखा है।
हैरानी की बात यह भी है कि इस पूरे फर्जीवाड़े के सामने इलाके के बाकी डिग्रीधारी ‘महारथी’ पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। सवाल स्थानीय स्तर पर जनहित की आवाज उठाने का दावा करने वाले स्तंभों पर भी उठ रहे हैं। आखिर इस गंभीर मुद्दे पर कलम और आवाज मौन क्यों हैं? क्या तंत्र की इस साठगांठ में सच सामने लाने वाली आंखें भी अनदेखी करने पर मजबूर कर दी गई हैं?
यदि जिला प्रशासन और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने केशवाही के इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और झोलाछाप डॉक्टरों के ठिकानों पर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो किसी बड़े स्वास्थ्य हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता। अब देखना यह होगा कि प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागकर इस नेटवर्क पर शिकंजा कसता है या फिर कागजी खानापूर्ति का यह खेल ऐसे ही जारी रहेगा।
मामला यहीं नहीं रुगेगा,अब इसको प्रश्रय देने और लाभ लेने वालों की भी जांच करनी चाहिए..?
शेष अगले अंक पर…












