भ्रष्टाचार की फगुआ और साहबों का ‘ठाठ’

शहडोल। जिले में इस बार रंगों की जगह ‘सेटिंग’ का गुलाल उड़ेगा। अधिकारियों की टोली ने अपनी-अपनी ‘पिच’ तैयार कर ली है। पेश है कुछ खास पंक्तियाँ

कमिश्नर और कलेक्टर के नाम…

मैदान से दूरी, कैमरे से करीबी,

साहब की रील में न दिखे गरीबी।

“खेत खाए गदहा, मार खाए जोलाहा”—भ्रष्टाचार नीचे हो रहा है, और ऊपर साहब बस फिल्टर लगाकर फोटो खिंचवा रहे हैं।

पुलिस और खनन माफिया की ‘जुगलबंदी’

रेत की ट्रैक्टर चले, सट्टे की चले चाल,

थानेदार साहब पूछें— “का हाल है बे, कितना आया माल?”

SP साहब की मौन सहमति ऐसी, जैसे “गूंगे का गुड़”। खा सब रहे हैं, पर बोल कोई नहीं रहा। यहाँ होली पर रंगों की बौछार नहीं, रेत के डंपरों की रफ़्तार दिखती है।

 नेताओं का ‘भौकाल’ और सोशल मीडिया

विधायक जी का भौकाल ऐसा कि “हाथी चले बाजार, कुत्ता भौंके हजार” वाली कहावत भी शरमा जाए। जनता से दूरी इतनी कि “आंख के अंधे, नाम नयनसुख”। सांसद महोदया तो बस ‘लाइक-कमेंट’ की भूखीं हैं, जनता की तकलीफों पर उनका नेटवर्क ‘आउट ऑफ कवरेज’ रहता है।

शहडोल की ‘होली चालीसा’ 

जेब गरम, ईमान नरम, शहडोल की यही रीत,

जनता रोए खून के आंसू, साहब गाएं जीत के गीत।

रेत बिकी, सट्टा चला, थानेदार खुशहाल,

नगर पालिका चूस रही, जनता का हाल बेहाल।

अधिकारियों के लिए विशेष ‘होली गिफ्ट’

  एसडीएम साहबों को, एक एक्स्ट्रा तकिया, ताकि आराम में कोई खलल न पड़े।

 सीईओ साहबों को, एक नया ‘जुगाड़’ कैलकुलेटर, ताकि कमाई का हिसाब सटीक रहे।

 विधायक जी को, एक बड़ा आईना, ताकि उसमें जनता के बजाय खुद का ही ‘भौकाल’ देख सकें।

 नगर पालिका को, ‘स्ट्रॉ’ , ताकि जनता का खून चूसने में आसानी हो।

स्थानीय मुहावरा विशेष, शहडोल के सरकारी दफ्तरों में आजकल एक ही कहावत चरितार्थ है— “अपना हाथ जगन्नाथ”। यानी जितना बटोर सको, बटोर लो, क्योंकि अगली होली तक कुर्सी रहे न रहे, पर जेब भारी रहनी चाहिए।

पंचायतों में जमे कुछ नामचीन सचिवों पर..

गोहपारू जनपद में अंगद की पांव की तरह जमे शंकर,बिसाहू,अजीत,आशुतोष,चंद्रशेखर,संतोष, कोदू लाल इनकी माया है अपरम्पार.. जय हो सरकार

बुरा न मानो होली है… और शहडोल में तो भ्रष्टाचार की ‘टोली’ है!

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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