शहडोल। जिले के जयसिंहनगर स्थित शबरी माता कन्या छात्रावास की छात्राएं जब अपनी समस्याओं को लेकर पैदल ही कलेक्ट्रेट की ओर निकलीं, तो प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया। पिछले कुछ हफ्तों में जिले के अलग-अलग हॉस्टलों से लगातार छात्रों का यूं सड़कों पर उतरना और सीधे कलेक्टर से मिलने की जिद करना अब महज एक सामान्य विरोध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पटकथा की ओर इशारा कर रहा है।
इस पूरी घटना ने जिले की प्रशासनिक व्यवस्था और अंदरूनी खींचतान पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सख्त निरीक्षण और कार्रवाइयों का असर?
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से कलेक्टर,जिला पंचायत सीईओ, जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा लगातार स्कूलों एवं छात्रावासों का औचक निरीक्षण किया जा रहा है। लापरवाही बरतने वाले अधीक्षकों, शिक्षकों और कर्मचारियों पर ताबड़तोड़ कार्रवाइयों का दौर जारी है।
ऐसे में प्रशासनिक और स्थानीय हलकों में यह सवाल तेजी से कौंध रहा है।
क्या यह प्रदर्शन कार्रवाइयों का परिणाम है?
क्या लगातार हो रहे निरीक्षणों, निलंबित होते कर्मचारियों और कसते शिकंजे से बौखलाया हुआ स्थानीय अमला अपनी गर्दन बचाने के लिए यह सब करवा रहा है?
सहायक आयुक्त का सेवानिवृत्त काल
जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त का रिटायरमेंट बेहद करीब है। ऐसे समय में विभाग को निशाना बनाना और छात्रावासों से शिकायतों को एकाएक तूल देना प्रशासनिक दबाव बनाने की साजिश की ओर इशारा करता है।
मासूम छात्राओं के कंधे पर रखकर चलाई जा रही बंदूक?
जिले के प्रबुद्ध जनों और जानकारों का मानना है कि दूर-दराज के हॉस्टलों से छात्राओं का इस तरह एकजुट होकर पैदल निकलना बिना किसी अंदरूनी शह या ‘मास्टरमाइंड’ के संभव नहीं है।
कार्रवाई से ध्यान भटकाने की साजिश?
क्या निरीक्षण में पकड़ी जा रही कमियों और होने वाली विभागीय कार्रवाइयों को रोकने या डायवर्ट करने के लिए मासूम छात्राओं को मोहरा बनाया जा रहा है?
अंदरूनी सरपरस्ती
क्या विभाग या जिले का ही कोई अधिकारी,कर्मचारी अपनी रंजिश निकालने या प्रशासनिक कड़ाई को ढीला करने के लिए इन प्रदर्शनों की डोर पीछे से खींच रहा है?
निष्पक्ष जांच की दरकार, कौन और कब खोलेगा राज?
छात्राओं की बुनियादी समस्याएं पूरी तरह वाजिब हो सकती हैं और उन पर तत्काल सुधार होना ही चाहिए। लेकिन जिस तरह से कड़े निरीक्षणों के बीच अचानक प्रदर्शनों की बाढ़ आई है, उसने पूरे मामले को संदेहास्पद बना दिया है।
दोहरे पहलुओं की पड़ताल जरूरी
यदि छात्रावासों में वास्तव में सुविधाएं बदहाल हैं, तो अब तक ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
यदि प्रशासनिक निरीक्षणों और कार्रवाइयों के डर से कोई सिंडिकेट मासूम छात्राओं को उकसाकर कलेक्ट्रेट भेज रहा है, तो उस पर्दे के पीछे छिपे ‘मास्टरमाइंड’ की पहचान कर उस पर आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।
प्रशासनिक सख्ती और लगातार हो रही कार्रवाइयों के बीच छात्राओं का सड़कों पर उतरना यह साफ करता है कि दाल में कुछ काला जरूर है। यदि यह प्रदर्शन तंत्र की बौखलाहट और कार्रवाइयों से बचने का ‘काउंटर अटैक’ है, तो प्रशासन को और सख्त कदम उठाने होंगे। फिलहाल, पूरे जिले की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले की जांच कराकर असली चेहरे को कब बेनकाब करते हैं।












