अभावों के ‘अंधेरे’ में कर्तव्य की ‘लौ’, मुट्ठी भर अमले के भरोसे शहडोल आबकारी

शहडोल। जहाँ एक ओर जिले में अवैध शराब के कारोबार को लेकर विभाग पर उंगलियाँ उठ रही हैं, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि शहडोल आबकारी विभाग खुद ‘बेबसी’ के दौर से गुजर रहा है। विशाल भौगोलिक क्षेत्र वाले इस जिले की सुरक्षा का जिम्मा महज एक-दो अधिकारियों और उंगलियों पर गिने जाने वाले आरक्षकों के कंधों पर है। सवाल यह है कि क्या संसाधनों के इस अभाव में विभाग से शत-प्रतिशत परिणाम की उम्मीद करना बेमानी नहीं है?

एक उप-निरीक्षक और मुट्ठी भर सिपाही, कैसे रुकेगा माफिया?

आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पूरे जिले की निगरानी के लिए विभाग के पास स्वीकृत पदों के मुकाबले नगण्य स्टाफ उपलब्ध है। वर्तमान में स्थिति यह है कि..

सीमित अधिकार एक या दो राजपत्रित अधिकारी और महज एक उप-निरीक्षक के भरोसे पूरे जिले की चौहद्दी टिकी है।

 आरक्षकों का अकाल, जिले में आबकारी आरक्षकों की संख्या इतनी कम है कि उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है।

  विशाल कार्यक्षेत्र, घने जंगलों, दूरस्थ अंचलों और पड़ोसी राज्यों की सीमाओं से सटे शहडोल में दबिश देने के लिए कम से कम 20-30 सक्रिय आरक्षकों की टोली की आवश्यकता होती है, लेकिन यहाँ ‘बैकअप’ के नाम पर कुछ भी नहीं है।

कमजोरी नहीं, ‘जज्बे’ की भी है कहानी

संसाधनों की इस भारी किल्लत के बावजूद, उपलब्ध अमला जिस तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, वह काबिले तारीफ है। हाल के दिनों में विभाग ने कई छोटी-बड़ी कार्रवाइयां कर यह साबित किया है कि इरादे नेक हों तो संख्या बल आड़े नहीं आता।

 निरंतर छापेमारी, बिना पर्याप्त पुलिस बल के सहयोग के, आबकारी की छोटी टीमें मुखबिर तंत्र के आधार पर अवैध ठिकानों पर दबिश दे रही हैं।

राजस्व की चिंता,  स्टाफ की कमी के बाद भी विभाग शासन को मिलने वाले राजस्व की सुरक्षा के लिए दिन-रात मुस्तैद है।

क्या सिस्टम ही जिम्मेदार है?

बड़ा सवाल यह है कि आखिर शासन कब तक इस संवेदनशील विभाग को ‘खाली हाथ’ रखेगा?

 क्या जिले को नए उप-निरीक्षक और आरक्षक मिलेंगे?

  क्या नई नियुक्तियों में शहडोल को प्राथमिकता दी जाएगी?

 बिना आधुनिक हथियारों और पर्याप्त वाहनों के, माफियाओं के संगठित गिरोह से लड़ना क्या जान जोखिम में डालना नहीं है?

आलोचना करना आसान है, लेकिन उन हालातों को समझना भी जरूरी है जिनमें विभाग काम कर रहा है। यदि जिले में अवैध शराब पर पूरी तरह लगाम लगानी है, तो केवल ‘वर्दी’ पर सवाल उठाने से काम नहीं चलेगा। शासन को तुरंत प्रभाव से यहाँ रिक्त पदों की पूर्ति करनी होगी और आधुनिक संसाधन मुहैया कराने होंगे। जब तक विभाग ‘फुल फोर्स’ में नहीं आता, तब तक मुट्ठी भर कर्मचारियों से चमत्कार की उम्मीद करना उनके साथ अन्याय होगा।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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