एकतरफा माहौल बनाने वाली योजनाओं के ‘भाग्यविधाता’ दाने-दाने को मोहताज, मैदानी अमले का महीनों से मानदेय अटका

शहडोल। मध्य प्रदेश में जो योजनाएं चुनाव का पासा पलट देती हैं, एकतरफा माहौल बना देती हैं, हारी हुई बाजी जिताकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे चेहरे तक बदल देती हैं… आज उन्हीं योजनाओं को जमीन पर उतारने वाला मैदानी अमला खून के आंसू रो रहा है। सूबे की ‘लाडली बहना’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के दम पर सरकारें तो आलीशान कुर्सियों पर काबिज हो गईं, लेकिन ग्राम पंचायत स्तर पर दिन-रात एक करने वाले रोजगार सहायक, उप-यंत्री और अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी आज महीनों से अपने जायज पारिश्रमिक के लिए तरस रहे हैं।
वोट बटोरने के लिए जनता के चरणों में साष्टांग दंडवत होने वाले
राजनेताओं को चुनाव जीतते ही इन कर्मचारियों के पेट की आग दिखाई देना बंद हो गई है।

घर, परिवार, EMI और बच्चों की पढ़ाई… सब ‘भगवान भरोसे’

शासन और प्रशासन की फाइलों में ये कर्मचारी सिर्फ एक संख्या हो सकते हैं, लेकिन धरातल पर इनकी जिंदगी दांव पर लगी है। पिछले कई महीनों से मानदेय न मिलने के कारण इन कर्मचारियों के घरों का बजट पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

बच्चों की पढ़ाई छूटना तय

स्कूलों और कॉलेजों की फीस भरने के लिए पैसे नहीं हैं।

बैंकों के नोटिस और EMI का बोझ

बाइक, घर या निजी लोन की EMI बाउंस हो रही है, जिससे कर्मचारी मानसिक तनाव में हैं।

उधारी की जिंदगी

राशन से लेकर दवाइयों तक के लिए मैदानी अमला कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है।
शासन का रवैया ऐसा है कि बजट **
‘आ गया तो आ गया, नहीं तो बाकी सब भगवान भरोसे’। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार के पास इन मजबूर कर्मचारियों के प्रति कोई नैतिक जिम्मेदारी बची है? या फिर ‘काम लो और आर्थिक शोषण करो’ ही इस सुशासन का असली चेहरा है?

भ्रष्टाचार में डूबे संगठन मौन, ‘चमचागिरी’ में व्यस्त जिला नेतृत्व

इस पूरे प्रशासनिक तमाशे में सबसे शर्मनाक भूमिका उन तथाकथित संघ और संगठनों की है, जो कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ने का दम भरते हैं। चंदे और कमीशनखोरी के खेल में डूबे ये संगठन आज इन मजबूर अधिकारियों-कर्मचारियों की आवाज बुलंद करने के बजाय मूकदर्शक बने बैठे हैं। इन्हें कर्मचारियों की लाचारी से ज्यादा अपनी जेबें गरम करने की फिक्र है।
वहीं दूसरी ओर, जिले के राजनीतिक रहनुमा और जिला अध्यक्ष जनता और कर्मचारियों की इस गंभीर समस्या को उठाने के बजाय सिर्फ और सिर्फ प्रशासनिक ‘चमचागिरी’ और अपनी गोटियां लाल करने में मग्न हैं। सत्ता के गलियारों में हाजिरी लगाने वाले इन नेताओं को मैदानी अमले की सिसकियां सुनाई नहीं दे रही हैं।

कौन सुनेगा… किसको सुनाएं ये दर्द?

जब योजनाएं लागू करानी होती हैं, तो चौबीस घंटे काम का दबाव बनाया जाता है। लेकिन जब बात पेट भरने की आती है, तो बजट का रोना रोकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। शासन और प्रशासन आज पूरी तरह से शोषण करने पर आमादा है।
जब योजनाओं की रीढ़ कहे जाने वाले रोजगार सहायक और इंजीनियर ही भुखमरी के कगार पर खड़े होकर पूछ रहे हैं कि—कौन सुनेगा और किसको सुनाएं ये व्यथा?”—तो फिर विकास के दावों की हवा निकलना लाजमी है। अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोया शहडोल प्रशासन और भोपाल में बैठे हुक्मरान इस शोषण को कब रोकते हैं, या फिर मैदानी अमला यूं ही बेबस और लाचार बना रहेगा।

सुभाष गौतम
Author: सुभाष गौतम

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