शहडोल। जिला पंचायत शहडोल में मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा जारी एक आदेश ने जिले की पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और स्थानीय स्वशासन के अधिकारों के बीच एक बड़ा टकराव खड़ा कर दिया है। यह आदेश, जो फर्जी बिलों और वित्तीय अनियमितताओं पर लगाम लगाने के उद्देश्य से लाया गया है, अब सरपंच संघ के तीखे विरोध का केंद्र बन गया है।
इस विवाद की जड़ें गोहपारू जनपद पंचायत से जुड़ी हैं, जहाँ नवागत सीईओ सुधीर दिनकर ने ब्लर बिलों और व्यापक भ्रष्टाचार की शिकायतों के मद्देनजर सर्वप्रथम बिलों के सख्त सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी मॉडल को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ ने 4 नवंबर 2025 को आदेश क्रमांक जि.प.सामा.अके/2025/3206 के तहत यह व्यवस्था जिले के सभी पाँच जनपदों में अनिवार्य रूप से लागू कर दी है।
प्रशासन का पक्ष; क्यों जरूरी है सत्यापन?
प्रशासनिक अधिकारियों का मत है कि यह कदम जनता के पैसे की सुरक्षा और सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अपरिहार्य है।
गोहपारू जनपद पंचायत से शुरुआत
गोहपारू सीईओ सुधीर दिनकर की पहल इस बात का प्रमाण थी कि निचले स्तर पर ‘ब्लर बिल’ और ‘बिल-सिंडिकेट’ की समस्या गहरी है, जहाँ वेंडर, सचिव और कुछ प्रतिनिधि मिलकर बजट का बंदरबांट करते थे।
उद्देश्य; जिला पंचायत सीईओ द्वारा जारी आदेश का स्पष्ट उद्देश्य मनरेगा, 15वें और 5वें वित्त जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के भुगतान से पहले निर्माण कार्यों का भौतिक सत्यापन अनिवार्य करना है, ताकि कागजों पर सड़क न बनकर, वास्तव में जमीन पर विकास दिखे।
अधिकारी का मत; एक वरिष्ठ जिला पंचायत अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “इस आदेश का उद्देश्य ईमानदार सरपंचों को परेशान करना नहीं है। जो नियमों के तहत काम कर रहे हैं, उन्हें डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह केवल उन तत्वों पर प्रहार है जिन्होंने नियमों की आड़ में वर्षों से धांधलियां की हैं। सत्यापन से जवाबदेही बढ़ेगी।”
ग्रामवासियों का बड़ा वर्ग इस पहल का स्वागत कर रहा है, उनका कहना है कि अब अधिकारी खुद जांच करेंगे तो फर्जी बिल पास होने की संभावना कम होगी और उनका पैसा सुरक्षित रहेगा।
सरपंच संघ का पक्ष; अधिकारों पर आघात
जिला सरपंच संघ अध्यक्ष के नेतृत्व में, इस आदेश को स्थानीय स्वशासन के अधिकारों पर सीधा हमला मान रहा है। उन्होंने ज्ञापन सौंपकर आदेश को निरस्त करने की मांग की है।
अधिकारों का हनन; सरपंच संघ का तर्क है कि पंचायतों को भारतीय संविधान के तहत जो अधिकार और वित्तीय शक्तियाँ मिली हैं, यह आदेश उन पर अत्यधिक और अनुचित नियंत्रण स्थापित करता है। उनका कहना है कि भुगतान को रोके जाने का डर दिखाकर, विकास कार्यों को धीमा किया जा रहा है।
भ्रष्टाचार का नया रास्ता; सरपंच लॉबी का एक गंभीर आरोप यह भी है कि ‘पारदर्शिता’ तो मात्र एक बहाना है। उनके अनुसार, यह नया सत्यापन तंत्र अधिकारियों की ‘हिटलर शाही’ को बढ़ाएगा, जिससे वे पंचायतों पर दबाव बनाकर अपनी निहित स्वार्थों की पूर्ति कर सकें, जो अंततः भ्रष्टाचार का एक नया रूप लेगा।
अविश्वास का माहौल; सरपंचों का मानना है कि यह आदेश उन पर अविश्वास व्यक्त करता है, जबकि वे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं। उनका मत है कि इस तरह की व्यवस्था लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।
जवाबदेही और अधिकारों में संतुलन
शहडोल का यह विवाद भारतीय पंचायत व्यवस्था में अक्सर सामने आने वाले जवाबदेही और स्वायत्तता के द्वंद्व को दर्शाता है।
जवाबदेही की जीत; जिला पंचायत सीईओ का यह कदम प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करता है और यह सुनिश्चित करता है कि जनता का पैसा सही तरीके से खर्च हो। गोहपारू सीईओ सुधीर दिनकर की पहल ने जिले को यह रास्ता दिखाया है।
स्वायत्तता का प्रश्न; वहीं, सरपंच संघ का विरोध इस बात पर ज़ोर देता है कि स्थानीय प्रतिनिधियों की स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए।
फिलहाल, जिला पंचायत प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि आदेश की अनदेखी पर कार्रवाई तय है। यह देखना होगा कि यह नया सत्यापन तंत्र पंचायतों में वित्तीय अनुशासन लाता है, या फिर जैसा कि सरपंच संघ आशंका जता रहा है, यह केवल एक नए किस्म के प्रशासनिक हस्तक्षेप को जन्म देता है।











