जनसुनवाई के ‘कागजी’ समाधान और प्रशासनिक उदासीनता की पड़ताल

शहडोल। जिले में प्रशासनिक तंत्र और आम जनता के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। मंगलवार की जनसुनवाई हो या कार्यालयों में मिलने वाले आवेदन, फाइलों का अंबार तो बढ़ रहा है, लेकिन धरातल पर समाधान की स्थिति “ढाक के तीन पात” वाली बनी हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या जिले के आला अधिकारी—डीएम और एसपी—केवल व्यवस्था के संचालन तक सीमित हैं? क्या शिकायतों का ‘फॉलो-अप’ लेना अब प्रशासनिक कार्यसूची का हिस्सा नहीं रहा?

समाधान या मात्र औपचारिकता?

शासन के निर्देशानुसार कलेक्टर कार्यालय से लेकर तहसील और जनपद स्तर तक जनसुनवाई आयोजित की जाती है। भारी भीड़ उमड़ती है, लोग अपनी उम्मीदों का पुलिंदा अधिकारियों को सौंपते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आवेदन जमा होने के बाद उस पर क्या कार्रवाई हुई, इसका फीडबैक लेने की कोई पारदर्शी व्यवस्था जिले में नजर नहीं आती।

 निचले स्तर के अधिकारी शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। जब तक ऊपर से कड़ा ‘फॉलो-अप’ न हो, तब तक फाइलें अपनी जगह से नहीं हिलतीं।

निजी अस्पतालों का ‘फीस पहले, सेवा बाद में’ वाला मॉडल

जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवालिया निशान हैं। निजी डॉक्टरों के पास जाने पर सहानुभूति से पहले काउंटर पर भारी-भरकम फीस मांगी जाती है। संवेदनशीलता की जगह अब व्यावसायिकता ने ले ली है। आम आदमी जिसे ‘धरती का भगवान’ मानता है, वहां अब आर्थिक शोषण की शिकायतें आम हो चुकी हैं, जिस पर स्वास्थ्य विभाग का कोई नियंत्रण नहीं दिखता।

कहां है विजन? कहां है विभागवार समीक्षा?

एक सजग प्रशासन की पहचान इस बात से होती है कि वह समस्याओं के निपटारे का डेटा सार्वजनिक करे। जिले में ऐसी दूरदर्शिता का अभाव दिखता है।

  विभागवार समीक्षा क्या साल दर साल यह देखा जाता है कि किस विभाग में कितनी शिकायतें आईं और कितनी हल हुईं?

 पुरस्कार एवं दंड क्या बेहतर काम करने वाले कर्मचारी को सम्मानित और कामचोर को दंडित करने की परंपरा है?

 सक्रिय फीडबैक क्या डीएम या एसपी कभी रैंडम आधार पर शिकायतकर्ताओं को फोन कर पूछते हैं कि क्या वे कार्रवाई से संतुष्ट हैं?

“कठपुतली” बना प्रशासन और सुरक्षा तंत्र?

जिले की जनता के बीच यह धारणा प्रबल हो रही है कि प्रशासन और सुरक्षा तंत्र केवल रसूखदारों के इशारों पर या रूटीन कार्यों तक सिमट गया है। डीएम और एसपी जैसे पदों पर बैठे अधिकारियों से जिस त्वरित निर्णय क्षमता और ‘इच्छाशक्ति’ की उम्मीद की जाती है, वह वर्तमान में नदारद दिखती है। जनता के मन में यह सवाल कौंध रहा है कि भारी-भरकम वेतन और सुविधाओं के बदले क्या उन्हें केवल ‘इंतजार’ ही मिलना है?

जनता की नाउम्मीदी और भविष्य के सवाल

शहडोल जिले का दुर्भाग्य है कि यहां समस्याओं का अंबार है लेकिन उनके समाधान के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं। जब जिले के प्रमुख ही अपनी आंखें बंद कर लेंगे, तो निचले स्तर का अमला निरंकुश होना स्वाभाविक है। क्या प्रशासन कभी नींद से जागेगा? क्या कभी फाइलों से निकलकर अधिकारी जनता के दर्द को जमीनी स्तर पर समझेंगे?

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