शहडोल। बधाई हो! शहडोल ने सत्ता संचालन का एक नया ‘मौन कीर्तिमान’ स्थापित किया है। यहाँ के जनप्रतिनिधियों ने वह दुर्लभ योग सिद्ध कर लिया है, जहाँ आँखों के सामने रेत की नदियाँ लुटती हैं, गलियों में नशा ज़हर बनकर घुलता है और प्रशासन की लाठियाँ बेगुनाहों की आहें निकालती हैं—लेकिन हमारे माननीय ‘ध्यान मुद्रा’ में लीन हैं।
सत्ता का ‘एसी केबिन’ और जनता की धूल
वाह रे व्यवस्था! जनता धूल फांक रही है और हुक्मरान वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘विकास’ का ग्राफ बना रहे हैं। यह विकास किसका है? उन चंद कबाड़ियों का, जो अब रसूखदार बन चुके हैं? या उन नशा तस्करों का, जिनकी छाया में एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो रही है? शायद हमारे नेताओं को लगता है कि सत्ता कोई ‘अमर पट्टा’ है, जो विरासत में मिला है और हमेशा रहेगा।
संगठन की ‘आहुति’ और चाटुकारों का उत्सव
जो कार्यकर्ता कभी विचारधारा की मशाल लेकर चलते थे, आज वे कोने में खड़े होकर अपनी ही सरकार की बेबसी पर आंसू बहा रहे हैं। संगठन की नींव में दरारें नहीं, खाई पड़ चुकी है। लेकिन दरबारियों की फौज ने साहबों को यह समझा दिया है कि “सब चंगा सी!” याद रखिये, जब नींव डगमगाती है, तो महल ऊँचे होने के बावजूद सबसे पहले गिरते हैं।
“इतिहास गवाह है, जब राजा को ‘जनता’ केवल ‘वोट’ दिखने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि सिंहासन की विदाई का काउंटडाउन शुरू हो चुका है।”
पत्रकारों की चेतावनी… या कयामत का सायरन?
आज पत्रकारों की कलम चुभ रही है, समाजसेवियों की आवाज़ शोर लग रही है। लेकिन यह शोर नहीं, उस गुब्बारे के फटने की आहट है जिसे आपने अहंकार की हवा से भरा है। आप वर्तमान के ‘कमीशन’ में इतने अंधे हैं कि आपको अपना धुंधला होता राजनीतिक भविष्य दिखाई नहीं दे रहा।
जनता का ‘सेंसर बोर्ड’ तैयार है!
आप भले ही प्रशासन के जूतों तले सच्चाई को कुचल दें, लेकिन जनता की याददाश्त बड़ी लंबी होती है। आज जो आप ‘मूक’ और ‘निर्विकार’ बने बैठे हैं, कल वही जनता आपके नाम पर ‘क्रॉस’ का निशान लगाएगी। शहडोल की यह खामोशी कोई साधारण शांति नहीं है, यह उस तूफान से पहले का सन्नाटा है जो बड़े-बड़े सूरमाओं को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक देता है।
Author: सुभाष गौतम
जनहित के लिए बुलंद आवाज









